राजस्‍थान पत्रिका

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सोमवार, 13 नवंबर 2017

अस्तित्व के अभिप्रेरक प्रेम की खरी कविताएँ - सवाई सिंह शेखावत

मित्र कवि कुमार मुकुल का अंतिका प्रकाशन से :'एक उर्सुला होती है' शीर्षक से तीसरा कविता संकलनआया है। इससे पूर्व 'परिदृश्य के भीतर''(2000)और 'ग्यारह सितम्बर और अन्य कविताएँ'(2006)शीर्षक से उनके दो संग्रह आ चुके हैं। बक़ौल डॉ विनय कुमार मुकुल महीन संवेदना के कवि हैं- जीवन के आदिम राग और रस की गूँज से परिपूर्ण।वे यह भी कहते हैं कि कवि के अचेतन से निकले जीवन-राग की इस गूँज को कविताओं में गाना इतना आसान भी नहीं है,पर कुमार मुकुल के कवि ने उसे तन्मयता और ईमानदारी से गाया है।वह भी नागर हिंदी में लोकभाषा की साधिकार आवाजाही के साथ।
जहाँ उनकी कविताएँ लोकगीत को छूती-सी लगती हैं।यहाँ देखने लायक बात यह भी है कि जीवन के आदिम राग से जुड़कर भी ये कविताएँ प्रेम के निरे आत्मीय आवेगों की (इन फिरोज़ी होठों पर बर्बाद मेरी ज़िंदगी-धर्मवीर भारती)कविताएँ नहीं हैं।उस सब के साथ यहाँ प्रेम की उलझने, दुर्घटनाएँ व उदासी भी दर्ज है।इसीलिए इन्हें अस्तित्व के मूल अभिप्रेरक प्रेम की बहुरंगी छवि की सच्ची और खरी कविताएँ कहा जा सकता है। 

'एक उर्सला होती है' शीर्षक के जरिए कुमार मुकुल जीवन-राग कि इसी मूल शक्ति पर एकाग्र होते हैं।लेकिन यह सिलसिला एकतरफा नहीं है। विसेंट वान गाग के उदाहरण के जरिए वे कहते हैं कि सृजन-कर्म में हर विसेंट की एक उर्सुला होती है।पर क्या यह भी सच नहीं है कि हर कवि अपने स्तर पर एक विसेंट भी होता है।कुमार मुकुल का कवि यहाँ प्रेम के उसी आवेग,ऊष्मा और तन्मयता का कवि है।तन्मयता अर्थात जीवन कि वह अनुपूरक पारस्परिकता जिसके चलते कोई भी सृजन- कर्म फलीभूत होता है जिसे लेकर कवि की पंक्तियां हैं:
तन्मयता: 'समझते हैं ना आप
तन्मयता के माने
तब हमारे आसपास की
हर वस्तु बोलने लगती है
हमारी भाषा।'
अस्तित्व के इसी सहज अनुराग की उपस्थिति के चलते मैंने इन्हें प्रेम की सच्ची-खरी कविताएं कहा है।वह भी ऐसे समय में जब तमाम वर्चस्वी ताकतों ने प्रेम को महज एक वस्तु में बदल दिया हो।

अस्तित्व की इसी बुनियादी शर्त का स्वीकार करने वाला कवि ही लिख सकता है कि:
'मुझे जीवन ऐसा ही चाहिए था
अपने मुताबिक
अपनी गलतियों से सजा-धजा
यह लिखते हुए कितनी शर्म आएगी कि
मैंने कष्ट सहे हैं!'
एक सच्चा और खरा कवि ही जीवन की शुभता के क्रम में अपनी कविताओं में जीवन की चाहत के तमामतर पहलुओं को शुमार करता है।वहाँ 'मीठा-मीठा गप्प' और 'कड़वा थू-थू' की सैद्धान्तिकी नहीं चल सकती। जैसा कि स्विस मनोचिकित्सा शास्त्री कार्ल गुस्ताव जंग ने कहा था कि 'जीवन अनुपूरकता का उत्पाद है। ज्ञान अकेले सच्चाई पर नहीं अपितु गलती पर भी टिका है- खुशी शब्द अपना अर्थ को देगी यदि उसे उदासी से संतुलित नहीं किया जाए।'पर शर्त इतनी ही है कि जीवन की इस जद्दोजहद में हम हमेशा ऊर्ध्वमुख रहें।जिसे लेकर 'उड़ान हूँ मैं'(राइनेर मारिया रिल्के के लिए)कविता में कवि ने लिखा है:
'जीवन बढ़ता है हमेशा
तमाम तय अर्थों को व्यर्थ करता हुआ
नयेआकाश की ओर
हो सके तो तुम उसका हिस्सा बनो
तनो मत बात बेबात
बल्कि खोलो ख़ुद को
अंधकार के गर्भ ग्रह से
जैसे खुलती है सुबहें
एक चुप के साथ
नहीं तुम्हारी डाल नहीं हूँ मैं
उड़ान हूँ फिर फिर!'

ऐसा कवि ही मृत्यु के विरुद्ध जीवन की शाश्वत अमरता का श्राप लिए किसी के इर्द-गिर्द अपने मन को टिकाए खिड़की के धुंधलाते सितारों को तकते- निहारते हुए झींगुरों के समवेत स्वर में गाए जाते जीवन-राग का स्वागत कर सकता है।और नेट की खिड़की के खुलने में जाते प्रेम में पगी लड़की की आंखों के लाल डोरों में पिरोए दर्द के महीन जाल को चीन्ह सकता है-जिसकी सरल पारदर्शी आकांक्षाओं में उसे आज भी शबरी कि वह अनूठी चाहत साकार होती दिखती है जो अपने प्रिय को हर सौगात पहले चख कर परोसने की हामी है।प्रेम का यह अनन्य विरल संवेग ही जीवन की असल बुनियाद है।कवि कुमार मुकुल की खूबी जीवन के उस काँपते-लरजते रोमांच को लक्षित करने में हैं-जो सपाट वक्ष में भी अपने भोले पवित्र प्रत्यावेगों को जगाए रखता है।

प्रेम की इस जीवंत शिनाख़्त के चलते ही कवि चाँद से जुड़ी समूची रोमानियत को खारिज करते हुए कह पाता है कि 'इससे प्यारी तो है अपनी धरती।' यहाँ कवि यह कहना भी नहीं भूलता: 
'यह चाँदनी सा होना अच्छा नहीं है
कि घटते-घटते
एकदम खत्म ही हो जाओ
पड़ जाओ स्याह'। 
प्रेम की व्यंजना में वह हवाओं की तरह होने का पक्षधर  है-
कभी सन-सन
कभी अंधड़
कभी गुनगुन
कभी गुम
कि न दिखो तो भी प्राण बसें तुम में!
ऐसे होने में ही कवि अपनी पहचान खोजता है-
जाता हूँ देखने
अपना होना
कि यह मैं हूँ।

कुमार मुकुल की कविताएँ इसीलिए प्रेम के समग्र स्वरूप की कविताएं हैं।जहाँं दर्द के इस रिश्ते को टीस संभाल लेती है और संभव हो पाता है कविता का वह महान व्यापार जहाँ शब्दों की बनिस्पत निस्तब्धता ज्यादा बजती है/ शिराओं में होकर।ऐसा कवि ही उदासी के साथ अकेले रहने में भी जीवन की आश्वस्तता खोज लेता है और लिख पाता है कि 'उदासी का मतलब ही है खुश होने की संभावना' और यह भी कि :जहाँ दो उदासियाँ मिलती हैं वहीं बनती है एक खुशी।'ऐसा कवि ही सादा सूफ़ी अंदाज़ में लिख सकता है कि-'शरीर के मायने नहीं कुछ ख़ास/जब तक उसमें हृदय नहीं धड़क रहा हो!'कुमार मुकुल का कवि इसी अवधारणा के चलते व्यक्ति के आदमी होने को असली चरित्र कहता है।

प्रेम की इसी प्रगाढ़ अनुभूति के चलते कवि बेचैनी को मानव जीवन की अमरता के कारक की तरह शुमार करता है और अपने को सोचता हुआ-सा हृदय बनाने का ख्वाहिशमंद है।जहाँ गहरे धँस कर जीवन जीते हुए वह नियति और उछाल दोनों के साथ जुड़कर फ़ैज़ और खय्याम दोनों एक साथ हो सके।अस्तित्व की इसी बुनियादी चाहत के तहत वह 'कुछ कच्चा मन रहने' और 'मन के संग बहने' की कामना करते हुए 'ये क्या ज़िद है'जैसी सशक्त ग़ज़ल लिखता है:
आँख ही नहीं दिखती कहाँ से इंतज़ार दिखे
बारहा तन्हाई की सूरतें हजार दिखें
हवाएँ चलती हैं रुत भी बदलती है
वो शै कहाँ है जो हर पल बेक़रार दिखे
दिखने को तो दिख जाती है हर सू वो ही
पर ये ज़िद क्यों कि मुझको आरपार दिखे!
क्योंकि वे जानते हैं यह आत्मा 
अपने ही शरीर से बेरुखी करती 
कहीं और जा समाने को मचलती है।
और यह भी कि दुनिया के तमाम तानाशाह अपने भीतर सिमटे होते हैं और एक बिखरती उर्सुला को बचाने की ज़िद में वे अपने अंदर की उर्सुला को मार चुके होते हैं।प्रेम की ऐसी प्रौढ़ और विरल सूक्ष्म कविताओं के लिए भाई कुमार मुकुल को दिल से बधाई!

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

सहज तरंगित काव्यात्मक रिपोर्टिंग का सुंदर कोलाज - राधेश्‍याम तिवारी

भारतीय साहित्य में यह विचित्र सी स्थिति हैे कि जिन आचार्याें ने काव्य की आलेाचना के सिद्धान्त गढ़े आमतौर पर वे कविता लिखने से बचते रहे। प्लेटो या अरस्तू ,दांडी, भामह से लेकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से आज तक जाने कितने विद्वानों ने कविता की श्रेष्ठता के सांचे तो तैयार कर दिए लेकिन उनकी कविताएं पढ़ने को कम ही मिलती हैं। महान समीक्षक आइ ए रिचर्ड्स ने साहित्य की समीक्षा के लिए कितने ही मानदंड स्थापित कर दिए लेकिन उनकी  भी आदर्श काव्य कृतियां पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं है। आज के  इस वैज्ञानिक युग में जब संचार माध्यमों में क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हों और भूमंडलीयकरण का व्यापक प्रभाव पूरे विश्‍व की जीवन शैली और सोच को प्रभावित कर रहा हो और सीरिया की आतंकवादियों  की व्यक्तिगत गतिविधियों की एक एक हरकत को अमेरिका में बैठ कर देखा जा रहा हो ऐसे परिवर्तन के दौर में जरूरी है कि कविताओं की समीक्षा समय के नए आयामों के संदर्भों और वैज्ञानिक उपलब्धियों से आए समाज में बदलाव के परिप्रेक्ष में की जाय।
कविताओं को समझने में विज्ञान का सहारा लिया जाने लगा है और  पाया गया हैे कि कविता और विज्ञान में एक रोमांटिक संबंध है।   क्योंकि कविताएं मस्तिष्‍क औेर विज्ञान से गहरे जुड़ी होती है।  इसलिए साहित्य, खास कर कविताएं किसी कवि के विशेष भावुक क्षणो की  विशुद्ध रिपोटिंग है जिसमे दृश्‍य जगत ओैर मस्तिष्‍क जगत में हो रही प्रतिक्रियाओं जैसी मिलावट नहीं होती।  इस दृष्टि से पत्रकार कुमार मुकुल की कविताएं इसी प्रकार शुद्ध रुप से भावुक क्षणों की ही रिपोर्टिंग लगती है।
कविता असल में पत्रकारिता क्षेत्र की रिपोर्टिंग  की तरह हेै जिसके क्षे़त्र अलग अलग हैं लेकिन कार्य संपादन में काफी समानताएं हैं। पत्रकारिता की रिपोर्टिंग का क्षेत्र जहां दृश्‍यमान जगत में होनेवाली घटनाओं का विस्तृत या संक्षिप्त रुप होता है वहां कविता मस्तिष्‍क के भाव जगत की अदृश्‍यमान तरंगों की रिपोर्टिंग होती है जो मस्तिष्‍क के दाहिने क्षेत्र में उठती है औेर निर्धारित  तरंगों के बाद अदृश्‍य हो जाती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जब कोर्इ्र व्यक्ति किसी की कविता पढ़ने लगता है तो उसके मस्तिष्‍क के उसी स्थल पर वैसी ही तरंगें उठने लगती हैें जैसे कविता लिखते समय कवि के मस्तिष्‍क में उठी थीं।
उदाहरण के लिए यदि कविता की कुछ पंक्तियां भी किसी को अच्छी लग जाती हैं तो तत्काल मुंह से ‘वाह! वाह! निकल जाता है।   या  उन पंक्तियों को याद करने की जरुरत महसूस होने लगती है, जबकि उपन्यास या गद्य विधा के साथ ऐसा नहीं होता। ‘‘ब्रेन इमेजिंग तक्नोलाजी’’ द्वारा प्रारंभिक स्तर पर अघ्ययन करने के बाद यह पता चला है कि जब कोई व्यक्ति जोर से पढ़ी जानेवाली कविता सुनता है तो उसके प्रमस्तिष्कीय स्तर पर गतिविधियां शुरु हो जाती हैं। यहां उल्लेखनीय हैे कि व्यक्ति के मस्तिब्क के दाहिने भाग में जब अधिक कंपकपी होती है तो रीढ़ तक  इसका असर महसूस होता है।
इसलिए कोर्इ्र कविता किसी को अच्छी या बहुत अच्छी लगना मस्तिष्‍क की  इसी प्रकिया की तीव्रता पर निर्भर करता है।  इस प्रकार विज्ञान की  इस ताजा अनुसंधान की दृष्टि से कविता  किसी क्षण विशेष में उठी दिमागी हलचल की रिपोर्टिग है।  इसलिए ‘‘एक उर्सुला होती है’’ कुमार मुकुल के मस्तिष्‍क  के भावना क्षेत्र की रिपोर्टिंग  का एक संग्रह   ओैर जिसे पढ़ते हुए मेरे मस्तिष्‍क का वह क्षेत्र एक्टिव होता रहा तो लगा कि प्रेम के लिए एक उर्सुला का होना आवश्‍यक हेै  जो किसी को कलाकार बनाने में मददगार साबित होती है।
यद्यपि अभी तक यह तय नहीं पाया हैे कि वास्तव में उर्सुला नाम की स़्त्री का विश्‍व के महान चित्रकार बिंसेंट वान गॉग  के साथ कितना ओैर कैेसा संबंध था? वास्तव में वान गॉग के व्यक्त्त्वि को निखारने में उसकी क्याा भूमिका रही होगी अभी तक निश्चित रुप से कुछ कहा नहीं जा सका है। उर्सुला औेर वान गॉग का यह संबंध कुछ कुछ कुछ राधा औेर कृष्‍ण जैसा ही रोमांटिक हैे जिसको आधार बना कर कई पुस्तकें लिखी गर्इ्र हैं लेकिन तथ्यों के नाम पर कोई्र ऐसा पुख्ता साक्ष्य नहीं है जो इन दोनो के बीच के इस संबंध को सत्यापित कर सके। वैसे वान गॉग के बारे जो तथ्य उपलब्ध हैं उनसे साबित होता हैे कि उसने जिन जिन महिलाओं के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाया था उन महिलाओं ने अस्वीकार कर दिया और यह पीड़ा उसके कैनवास पर महसूस की जा सकती  है।  फिर भी आलोचकों का एक वर्ग मानता हैे कि 1873 में जब वॉन गॉग मात्र 20 साल के थे, ब्रिक्स्टॉन जो लंदन के पास छोटा शहर  हुआ करता था,  रहने आए थे ओैर थेाड़े समय के लिए उर्सुला लोये के मकान में रहने का अवसर भी मिला था उन्‍हें। इस छोटी सी अवधि में इग्युनि लोये जो उर्सुला की बेटी थी, उसके साथ रोमांस भी हुआ था। लेकिन इस तथ्य का प्रमाण आज तक नहीं मिल सका कि वास्तव में वॉन का संबंध उर्सुला के साथ था या या उसकी बेटी इग्युृनी के साथ। लेकिन यह सही हेैे कि एक ऐसी स़्त्री वान गॉग के जीवन में जरुर थी जिसने उसके हाथोें मे ब्रश थमा दिया औेर दिल में प्यार भर दिया ।  इस समीक्षा में इसका उल्लेख इसलिए जरुरी हेै कि एक लंबी कविता ‘‘एक उर्सुला होती है’’ लिखी गई्र है जो इस काव्य   संग्रह का शीर्षक भी है और  जिसका संबंध वॉन गॉग से रहा था।  बेहतर कलाकृति के लिए एक उर्सुला की जरुरत होती है जो हर रचनाकार के दिमाग में रहती है ओैर उसे सबसे अलग या महान बनाती है।

कवि की कविताएं उसके मस्तिष्‍क में किसी खास मनःस्थितियो में तरंगित की भावनाओं  की  रिपोर्टिग है जो शब्दों के माध्यम से सीधे पाठक तक पहुंचती है ओैर उसके मस्तिष्‍क को भी तरंगित कर देती है। जैसे-
पता नहीं क्या हैे, तुम्हारे शब्दों में 
कि आंसू चले आते हेैं चल कर 
खुद ब खुद मुस्कुराते से।
कवि के इस संगह की कविताएं मानव मन की  कोमल भावनओं की बहुत ही बेहतर रिपेार्टिंग है। इस संग्रह में 58 विभिन्न मानसिक स्थितियों की कविताएं हैं जिनको पढने से पता चलता हैे कि मानव मस्तिष्‍क, एक अखरोट की तरह दिखनेवाले दिमाग के एक बिन्दु , से असंख्य  रिपोर्ट कविताओं के रुप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। ओैर इतनी कविताएं अंतिम  नहीं हैं। तभी तो एक लाख श्‍लोकों का महाभारत एक अदभुत महाकाव्य के रुप में हमारे पास धरोहर के रुप में वर्तमान है। इसलिए मात्र 58 कविताओ का संकलन उसकी तुलना में बहुत ही कम हैे जो कवि की प्रेम ओर रेामांस से जुड़ी हुर्इ्र सोच की विविधता को सामने लाता है।
रेामांटिक हेाने के साथ में संगीत की अदृश्‍य तरंगों  का तानपूरा भी सुनाई देता है इन कविताओं में।  इस संग्रह की इनकी किसी भी कविता को उदाहरण के लिए देख लें उनमें रेामानीपन के नए अंदाज की अनुभूति होती है।  जैसे आज के मटमैले सामाजिक मूल्यों औेर अमानवीय संवेदनाओं की सड़क पर चल़ते हुए अवसाद में भी प्रेम की फुहार गिरने का सा आनन्द हो,  जो थोड़ी देर  के लिए  जीवन को ताजगी का एहसास करा जाती है ओैर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि प्यार या हाहाकार दोनेा स्थितियो मे-
आदमी के अंतर और बाहर 
दसों दिसाआओं से आती है एक ही पुकार 
प्यार प्यार प्यार।
जिसे प्यार की दो कविताओं में प्रस्तुत किया गया है। 

प्रेम होने ओर होने के बाद नहीं होने दोनों स्थितियों में यह कम दिलचस्प नहीं है कि हर आदमी हर क्षण जीवन को किसी न किसी प्रकार के रोमांस के साथ जीता हेै, लेकिन दृश्‍य जगत में वह स्वीकार नहीं कर पाता। जीवन के अकेलेपन में यह रोमांस उदासी,  अपने होने न  होने की बेचैनी  ओैर  जीने की  लालसा के कारण मस्तिष्‍क  क्षेत्र में जो रिपोर्ट एकत्रित की जाती है वही  शब्दों में बदल कविताएं हो जाती हैं।  रोमांस ही है जो मनुश्‍य केा जीने के लिए प्ररित करता है ओैर मरने केा विवश कर देता है। कवि की एक रिपोर्ट हेै कि ‘‘यह  बेचेैनी ही अमरता है’’ जहां जीवन ओैर मृत्यु का प्रभाव शून्य हो जाता हैं।
संग्रह में ‘‘तीन गीत’’  के तहत तीन ऐसी कविताएं भी हैं जो  लगता है शिल्‍पगत  प्रयोग के तौर पर लिखी गई हैं। उन की थीम भी वही है। जो पूरे संग्रह की है।  जबकि सच्चाई यह है कि  कविताएं लिखते समय या सुनते समय दिमाग का जो हिस्सा तरंगित होने लगता है  वही हिस्सा संगीत का भी है। इसलिए गीतों को उस काव्यात्मक रिपोर्टिंग से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जैसे संग्रह की एक छोटी कविता -
प्यार
एक अमृत बूंद
जो समुद्र होना जानती है
और जब हो जाती है समुद्र
डूबो देती है सब कुछ।

इस संग्रह की एक सबसे बड़ी विशेषता है इसकी भाषागत सहजता और अनुभवों का सधा हुआ नियंत्रण जो भावनाओं की रिपोर्टिंग  के केालाज में कही  भी बाह़य जगत के किसी भी तरह का प्रभाव  आने नहीं देता। वैसी ही भावनाएं हैं जो किसी आह के कारण निकल कर सीधे आंखों से बहने चली आती हैं। आंखों से बहने के कारण वे आंसू बन कर निकल जाती हैं लेकिन शब्दों में बंध कर  वह पीड़ा अवसाद या उत्साह  की रिपोर्टिंग हो जाती हैं। नायक विहीन ये कविताएं धार्मिक या सामाजिक मूल्यों पर प्रहार नहीं करती। लेकिन रोमांस की चेतना के स्तर पर उसके विविध रुपों से परिचय कराती है।  ‘‘हां में तुम्हें प्यार करता हूं’’ या ‘‘अकाश भी एक पाताल ही है’ जैसी सहज सुरीली ओैर रोमांस मे पगी सुंदर रिपेार्टिंग दिमाग को  इतनी सहजता से तरंगित कर देती है कि हम कह उठते हैं
वाह!
वाह!
मुकुल जी ।            

गुरुवार, 8 जून 2017

सृजनात्‍मक जिजीविषा और जिगीषा का प्रतीक 'उर्सुला' - अनिल अनलहातु


हर रचनात्‍मक यात्रा में सहजीवन के रूप में किसी न किसी 'उर्सुला' की मौजूदगी अवश्‍य रहती है, इस संग्रह की कविताएं इसी बात की तस्‍दीक करती हैं। इस तरह कुमार मुकुल वॉन गॉग की 'उर्सुला' को एक प्रतीक में बदल देते हैं, उर्सुला जो प्रतीक है सृजनात्‍मक जीजिविषा और जिगीषा की। हर रचनाकार ओर कलाकार की जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब वह अपने रचनात्‍मक जीवन के चरम से गुजरता हुआ जीवन संघर्ष के थपेड़ों से जूझत है ऐसे में कोई 'उर्सुला' होती है जो उसके मानस को एक ढ़ाढस की तरह संबल प्रदान करती है। कहना न होगा कि यह वी उर्सुला है जो प्रसाद की कामायनी में मनु को श्रद्धा के रूप में मिलती है और उसके तुमुल कोलाहल से भरे जीवन में हृदय की बात की तरह राहत देती है।

कुछ इसी तरह बांगला कवि जीवनानंद दास ने भी अपनी कविताओं में उर्सुला को तलाशा है नाटर की वनलता सेन के रूप में।

' रात रात भर अंधकार में मैं भटका हूं

अशोक और बिम्‍बसार के धूसर लगते संसारों में

दूर समय में और दूर अंधकार में

मैं थका हुआ हूं -

चारों ओर बिछा जीवन के ही समुद्र का फेन

शांति किसी ने दी तो वह थी

नॉटर की वनलता सेन।

तो हर रचनाकार और कलाकार को उसके अंधेरे बंद कमरों से बाहर निकालती है एक उर्सुला एक वनलता सेन।

ये उर्सुलाएं जितनी बाहरी दुनिया में होती हैं उतनी ही भीतरी दुनिया में भी। बाजवक्‍त में कवियेां की खामख्‍याली में भी रहती हैं। जैसे आग्‍न्‍येष्‍का सोनी मुक्तिबोध के अंधेरे में विचरण करती रहती है जैसा कि रामविलास शर्मा कहते हैं। कवि लिखता है -

और होता है वह

एक विन्सेंट ही

ख़्याल को सनम समझता

ख़ुद को

ख़्याल से भी कम समझता

ये उर्सुलाएं यथार्थ के ऐंद्रिक धरातल पर जितनी होती हैं उसे अधिक अभौतिक और अशरीरी धरातल पर -

प्रेम शरीर की नहीं

आत्मा की बीमारी है

यह ज्वर जला डालता है सारे कलुष

प्रेमी बन जाते हैं

योद्धा पादरी शिक्षक

कवि का अभिप्रेत है कि यह प्रेम-ज्‍वर बना रहे सतत, क्‍येांकि यह ज्‍वर भर जाता है, आंखों में चमक, भाषा में खुनक और फिर तमाम विंसेंटों के भीतर उनकी उर्सुलाएं जाग पड़ती हैं, यहां तक कि -

दुनिया के क्रूरतम तानाशाह भी

अपने भीतर समेटते रहते हैं

एक बिखरती उर्सुला

ईवा ब्राउन और क्‍लारा पेताची को इन संदर्भों में देखा जा सकता है।

इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में ऐसी ही उर्सुलाएं रचे जाकर आकार पाती हैं।

कई कविताओं में कवि खामख्‍याली से निकलकर प्रेम के ठोस व ऐंद्रिक धरातल पर पूरी धज के साथ यात्रा करता है। जहां प्रेम, मृत्‍यु के साथ खत्‍म नहीं होता वह अपनी उदात्‍तता में मातृत्‍व में आकाश तलाशने लगता है -

वह

जो प्रेम करती है मुझे

कामना करती है अक्सर मेरी मृत्यु की

वह सोचती है

कि मैं मर जाउं एक बार

तो फिर से जिला लेगी वह

नये सिरे से

और साधिकार ले चलेगी

अंगुली पकड कर

नन्हें बालक.सा

अपने पीछे पीछे!

प्रेम की यह उदात्‍तता, गांधी और कस्‍तूरबा के परिपक्‍व प्रेम की ओर ईशरा करता है, जहां प्रेम ममत्‍व में तब्‍दील होता दिखता है।

कुमार मुकुल की कविताओं में प्रेम के कई शेड्स हैं। बड़े कैनवस पर प्रेम के इतने बहुविध चित्र कवि ने उकेरे हैं कि आप विस्मित हो जाते हैं। इन कविताओं की तन्‍मयता साथ बहा ले जाती है। कुछ कविताओं में जहां ममत्‍व में प्रेम अपनी सार्थकता और अमरता तलाशता है वहीं अन्‍य कविताओं में वह उससे एक साथीपने की उम्‍मीद भी करता है -

कि इस तरह वह

गोइंया सी

मेरे कंधों से लगकर चले।

ताकि दोनेां के जीवन एकाकार हो जाएं और उनके स्‍वप्‍न एक दूसरे की आंखों में पलें। क्‍योंकि -

उनकी संयुक्‍त हंसी से उद्भासित

सुबहें हैं उसमें

और

अंकवार. भर भर जिया गया

जीवन है

और शामें हैं

तेज भागती

अंधेरा करती जुल्फों को झटकती रातें

कि अकडती पीठ पर

धंसती हैं उंगलियां

कि कितना गहरा है दर्द

लौटता बारंबार

कंधे की नसों में

कि निगाहें हैं इसमें

तन्मयता में पगीं

कि अब कुछ नहीं किया जा सकता

आशंकाओं और अफवाहों का

कि यह जो तन्मयता है

आत्मीयता है

इसकी रौशनी में हम

जो देख रहे हैं

क्षितिज के पार

वह रहस्य नहीं है अब।

प्रेम सारे रहस्‍येां को अनावृत कर देता है, जहां कुछ भी गोपन नहीं रहता -

और उसकी मुस्‍कान

फूटने को होती है

एक अवर्णनीय उल्‍लास में

यह अवर्णनीय उल्‍लास तब फूटता है जब वह कंधे से लग जाती है -

वह अक्‍सर बहुत हुलसकर गले मिलती है

और जब अलग होती है

तब उसकी जगह उसकी तन्‍मयता ले लेती है।

गले लगने और फिर अलग हो जाने के बाद भी एक तन्‍मय स्‍पर्श कवि के जेहन पर बना रहता है, प्रेम का यह बड़ा ही विरल एहसास है, जो एक साथ एंद्रिक भी है और इंद्रियेतर अनुभव भी। यह एहसास हमें आध्‍यात्मिक अनुभवों तक ले जाता है, जहां हमारी आत्‍मा प्रकृति के साथ तदाकार हो जाती है। कवि कहता है -

तन्‍मयता

समझते हैं ना आप तन्‍मयता के माने

मतलब तब हमारे आस-पास की

हर वस्‍तु बोलने लगती है

हमारी ही भाषा।

लेकिन ऐसा भी नहीं कि कवि प्रेम की तन्‍मयता में डूबा जीवन और जगत से बेखबर है, वह इस दुनिया और उसकी कारगुजारियों से भी वाकिफ है और जानता है -

कि रोजगार की कारगुजारियों ने मुझे

बना दिया होता है

कितना लाचार अंधा.अपाहिज

कि राजकमल की पंक्तियों के निहितार्थों से डरता

चला जाता हूं मैं

खुद की तलाश पूरी करने।

कवि पचासों मील चलकर केवल उससे मिलने जाता है ताकि खोए खुद को तलाश सके, उस खुद को जो गमे रोजगार और व्‍यवस्‍था की किसी अंधी गली में गुम हो गया सा लगता है -

और महानगरों की जकड्न को बारहा झटकता

चला जाता हूं मैं भागता

उस कस्बाई दिशा की ओर

वहां उस विगलित कोने में उसे उसके अपने स्‍व से भेंट होती है, मिलता है वह खुद से

जाता हूं देखने

अपना होना

कि यह हूं मैं

उस मैं की आंखों में दिखते हैं उसे लाल डोरे । वे लाल डोरे जिनमें व्‍यक्‍त पीडा को कवि न सिर्फ पढ सकता है बल्कि कापी पर उकेर भी सकता है। यहां प्रेम द्वैत भाव को खत्‍म कर देता है और एकत्‍व के रूप में बचता है जैसा भक्‍त कवियों के यहां दिखता है।

प्रेम की इन कविताओं में जहां मानवीय संबंधों की उष्‍मा है, उत्‍साह, उछाह और उमंग है, वहीं उदासी और अवसाद भी है। वैसे भी उदासी खुशी का एक्‍सटेंशन ही होती है। बहुत गहरी खुशी बारहा हमें रूला भी देती है। दिनों बाद मिलने का उछाह एक दुलार से भरता है तो साथ ही आंखों की कोरों को नम भी कर देता है -

गले मिलने का उसका हुलास

उसी आंखें का डबडबायापन

लेकिन इसके साथ ही -

उदासी का एक मतलब है,

खुश होने की संभावना'

और विडंबना देखिए कि

' सब कोसते हैं,

इस संभावना को ही'।

खुशी और उसकी आयरनिकल संबंधों की पड़ताल करता हुआ कवि कहता है -

उदासी

एक सोया हुआ तार है

एक

खींचा हुआ तार है

खुशी

हर खींचे हुए तार को

आखिर

सो जाना है।

खींचे हुए और सोये हुए तार के बिंबों से खुशी और उदासी के मेटाफर अद्भुत हैं। इस तरह के मेटाफर वही कवि चुन सकता है जिसने जीवन में इसे उतनी ही शिद्दत से अनुभूत किया हेा। कुमार मुकुल प्रमाणिक और जिये भोगे गए अनुभूतियों के कवि हैं तभी इनकी कविताओं में एक साथ प्रेम के उत्‍ताप से पिघलती अनुभूतियां हैं तो दूसरी ओर अवसाद की मन:स्थितियों का विरल चित्रण भी -

अब आईना ही घूरता है मुझे

और पार देखता है मेरे

तो शून्य नजर आता है

अवसाद का यह वह क्षण है जब व्‍यकित अपनी पहचान खोने लगता है, खुद से ही बेगाना, अजनबी हो जाता है, तभी आईना में खुद को नहीं देखता बल्कि अब आईना ही उसे घूरता है और उकसे पार देखता है तो शून्‍य नजर आता है। यह शून्‍य भाव अवसाद का प्रमुख लक्षण है जब व्‍यक्ति पूरी तरह से नकारात्‍मकता और निराश के जंगलों में खो सा जाता है। अवसादित मन की निराशा को व्‍यक्‍त करने के लिए कुछ अद्भुत बिंब रचे हैं कवि ने। यहां चांद आभा, उत्‍फुल्‍लता और प्रेम का प्रतीक न बनकर स्‍वप्‍नों को रेतने वाला हंसिया बन गया है-

चांद की हंसिए सी धार अब

रेतती है स्वप्न

और दुख -

जहां खडखडाता है दुख

पीपल के प्रेत सा

अडभंगी घजा लिए

चरम अवसाद की मनोदशा को अभिव्‍यक्‍त करता एक और चित्र देखिए जहां आशा प्रेतनी की तरह अपनी सफेद जटा फैलाए हा हा हा हू हू हू कर रही है- कि चीखती है

आशा की प्रेतनी

सफेद जटा फैलाए

हू हू हू

हा हा हा

आ आ आ

हू हा आ के घ्‍वन्‍यात्‍मक बिंब द्वारा कवि प्रेतनी की चीख की भयंकरता और बढा देता है, यहां गौरतलब है कि यह प्रेतनी आशा का बिंब है, तो अवसाद की मनोदश का ऐसा यथार्थ और मार्मिक चित्रण अन्‍यत्र दृष्टिगत नहीं हेाता।

अगर भाषा स्‍मृतियेां के दबाव से बनती है तो कविताएं अवचेतन के गहरे दबाव और तनाव से नि:सृत होती है। यही कारण है कि कुमार मुकुल की कविताओं में अवचेतन का प्रवाह दिखता है, ये कविताएं अवचेतन या स्‍ट्रीम आफॅ सबकांसस के रूप में आकार पाती हैं, और शायद इसीलिए परिनिष्ठित हिंदी में लिखी इन कविताओं में कुमार मुकुल के अवचेतन मे धंसे मातृभाषा भोजपुरी के शब्‍द अनायास चले आते हैं। डांसती,धांगता,अड़भंगी,निंदियायी, अंकवार, हुलास, टुकुर-टुकुर, बबुआ सा आदि सैकड़ों भोजपुरी के शब्‍द आपको मिल जाएंगे। जो कविता के प्रवाह और अर्थान्विति को गति देते हैं। कुमार मुकुल की कविताओं से गुजरना अपने जिए गए जीवन और अनुभवों को एक बार फिर से जीना ही नहीं, बल्कि एक नई रोशनी और संवेदना के सथ उनसे जुड़ना होता है, जिसमें बहुत सारे तथ्‍यों और अनुभवों को आप एक नये आयाम, एक नये आलोक में देखने लगते हैं और जीवन की आपकी समझ और बढ जाती है।

गहरे प्रेम की गहरी कविताएँ ... प्रांजल धर

‘एक उर्सुला होती है’ कवि कुमार मुकुल का ताज़ा कविता संग्रह है जिसकी कविताएँ जीवन और समाज में छीजते जा रहे प्रेम को केन्द्र में लाते हुए एक सार्थक-साहित्यिक हस्तक्षेप की बुनियाद रखती हैं। इस संग्रह में कुमार मुकुल विंसेंट वॉन गॉग और उर्सुला के बहाने प्रेम की प्रचलित परिभाषाओं से मुठभेड़ करते हैं और भावनाव्यंजक शब्दों के प्रायः विस्थापित होते चले जा रहे अर्थों को उनके सही पते-ठिकाने पर वापस लाने का काम करते हैं। संग्रह की एक कविता है, जिसका शीर्षक है ‘वॉन गॉग की उर्सुला’। इस कविता की पंक्तियाँ हैं – “हाँ सचमुच की उर्सुला जब/ खो जाती है कहीं/ ज़िन्दगी की किताब में/ तब जीवित होने लगती है वह/ विंसेंट के लहू में/ निगाह में उसकी/ उसके इशारों में।” इस कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हमारे समय की उस बेबसी और भीतर तक पैठ चुके उस गहरे डर को रेखांकित करती हैं जो हम सबमें साझा है और जिसके कारण कहीं न कहीं तथाकथित समाज में तथाकथित सम्पर्कसूत्रता का आभास होता है। प्रेम की कोख में बैठा यही डर वह पहला झटका था जो विंसेंट वॉन गॉग को बहुत कम उम्र में ही लग गया था क्योंकि जब उन्होंने अपने मकान मालिक की लड़की उर्सुला से अपने प्रेम का इजहार किया था, तो उन्हें इस प्रेम की स्वीकृति नहीं मिली थी। कारण यह था कि उर्सुला किसी और व्यक्ति से प्रेम करती थी।
‘परिदृश्य के भीतर’ (2000) और ‘ग्यारह सितम्बर और अन्य कविताएँ’ (2006) के बाद यह कुमार मुकुल का तीसरा कविता संग्रह है। पहले के दोनों संग्रहों में अपनाए गये काव्यात्मक उपकरणों, भावना-निरूपण की शैलियों और व्यंजनात्मकता के प्रारूपों का विकास सहज ही इस तीसरे संग्रह की कविताओं में दीखता है। एक तरह से यह पहले के दोनों संग्रहों की अगली कड़ी और उनका आनुभविक विस्तार है क्योंकि इस संग्रह की कविताओं में कुमार मुकुल ऐसे विषयों से काव्यात्मक मुठभेड़ करते हैं, जिन पर उन्होंने इससे पहले, इतनी अधिक सघनता से नहीं लिखा था। वे यहाँ प्रेम को उसके मांसल और कल्पनातीत दोनों पहलुओं में देखते हैं और लिखते हैं कि “प्यार/ और दो नामालूम-से जन/ एक-दूसरे को बनाना शुरू करते हैं विराट/ तो फिर तमाम मिथकों और दन्तकथाओं को/ उनका पार पाना कठिन पड़ने लगता है।” प्रेम की अपरिभाषेय ऊँचाई का जायजा लेने वाले इस संग्रह की कविताएँ गहरे प्रेम की गहरी कविताएँ हैं। संग्रह में प्रेम की गहन भावनाओं से परिपूरित अनेक कविताएँ हैं लेकिन ये वैसी प्रेम कविताएँ नहीं हैं जिनमें जब तक दो-चार बार प्रेम-प्रेम शब्द न आए तब तक हम मान ही न पाएँ कि यह भी भला कोई प्रेम कविता है! फ़ेसबुक और तथाकथित नवीन जनसंचार माध्यमों के ज़माने में कुमार मुकुल की उर्सुला के अर्थ गूढ़ हैं। उतने ही गूढ़, जितने विंसेंट की ज़िन्दगी में थे।
कुमार मुकुल की इन कविताओं में प्रेम का सहज सौन्दर्य है, प्रेम के हित में किए जाने वाले त्याग और परित्याग की भावनाओं की लम्बी-सपाट और दुर्गम सड़कें हैं, समय-सापेक्ष प्रेम की विसंगतियों की नवीन शब्दावली है और आर्थिक अभावों व जीवन के झंझावातों से जूझते हुए कवि ने एक बेहतरीन संसार रचने की कोशिश की है। इन चीज़ों से जो बेचैनी उत्पन्न होती है, उसके बारे में मुकुल का कवि दर्ज़ करता है कि “यह बेचैनी ही अमरता है”। अमरता के छलावे को समझने वाले कुमार मुकुल साफ़ कहते हैं, “हम-तुम बदलते हैं/ समय बदलता है/ प्रीत कहाँ बदलती है।” प्रेम जब जीवन की अन्य आवश्यकतापरक और अपरिहार्यतामूलक चीज़ों से टकराता है, तब जो ऐंठन, तनाव व संघर्ष उत्पन्न होता है, उसे रचने में मुकुल सिद्धहस्त कवि हैं और यह क्लाइमेक्स इस संग्रह की अन्तिम कविता ‘उम्र के भीतर अमरता स्थिर किए’ में बखूबी दिखता है। वर्तमान जीवन के बेहद जटिल द्वन्द्व इन कविताओं में सौ बार उतरे हैं लेकिन मुकुल ने इन द्वन्द्वों के बीच में से हज़ार बार प्रेम का एक रास्ता गढ़ा है।
बहुत पुरानी चीज़ों के मायने किस ख़तरनाक तरीके से बदल जाते हैं, इस सामाजिक तथ्य को इतिहास और भूगोल के आलोक में देखते हुए ‘पत्थर पर’ नामक कविता एक नए आलोचकीय औज़ार के साथ प्रेम की व्याख्या की माँग करती है। इस कविता का अन्तिम हिस्सा बहुत विचार-भाव सम्पन्न है कि, “चाहे रेत पर तर्जनी से/ लिखो कोई नाम/ कि हवाएँ पढ़ लेंगी उसे/ और तमाशा नहीं बनाएँगी।” आज जब प्रेम ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन की अन्यान्य आधारिक भावनाएँ-संकल्पनाएँ तमाशे की शक्ल अख्तियार करती जा रही हैं, तब इस कविता की एक व्यापक सन्दर्भसापेक्षता बनती है। कुमार मुकुल की कविताओं में ‘कहीं कोई उदास गाता है’ और ‘अशेष दुष्टताओं का अभिनय’ करता है। कवि प्रेमिल व्यक्ति के रोष को दरकिनार करके कोमल कामनाओं की तरंगों में डूबता है। कवि की आत्मा भी अजीब होती है शायद। तभी मुकुल लिखते हैं कि “तू तो मेरी आत्मा का पोर्ट्रेट है कवि/ क्या इसे मैंने बनाया है/ या ज़माने के बनाए पोर्ट्रेट पर/ हस्ताक्षर भर कर दिए हैं मैंने।” मौलिकता के सन्धान की यह अकुलाहट इन प्रेम-कविताओं को बहुत विलक्षण बनाती है और रचयिता यहाँ स्वयं रचना से बाहर हो जाता है। कुछ बचता है तो रचना और पाठक के बीच का शान्तिपूर्ण संवाद। यह संवाद कवि ने प्रायः स्वयं से ही किया है, फिर भी यहाँ उन बीहड़ पगडण्डियों से किया गया संवाद भी मौज़ूद है, जिन पर कवि अपने जीवन वास्तव में चलता रहा है।
कुमार मुकुल संघर्षपूर्ण जीवन के कवि हैं, उम्मीद के कवि हैं, जनसरोकार के कवि हैं, ज़िन्दादिली के कवि हैं, गम्भीर और विश्लेषणपरक पत्रकारीय मस्तिष्क की प्रौढ़ता के साथ-साथ वे गाँव-जवाँर और किसान-देहात के कवि हैं। ‘एक उर्सुला होती है’ नामक इस संग्रह में भी वे इन सरोकारपरक विषयों से अपना ध्यान हटा नहीं पाए हैं, हालाँकि यह संकलन एक तरीके से प्रेम कविताओं का संकलन है। वे लिखते हैं, “बर्तन माँजते उसकी आँख बनी पीठ/ ये सब बुलाते रहते हैं मुझे/ और महानगरों की जकड़न को बारहा झटकता/ चला जाता हूँ मैं भागता/ उस कस्बाई दिशा की ओर।” ‘एक अच्छी-सी लड़की’ कविता में वे कहते हैं, “केक खिलाती है/ जिसका स्वाद वह शबरी की तरह पहले चख लेती है/ वह बहुत खुश होती है तो रोटी और दाल खिलाती है।” दाल-रोटी का यह संघर्ष इस कविता में प्रेम के कथानक से झाँकता रहता है, जैसे पौराणिकता में से सत्य या सत्य में से पौराणिकता झाँकती रही हो!
कविता की दुनिया की खूबसूरती यही है, कि यह हमें हमारे जीवन के अनजान-अनचीन्हे ऐसे कोनों तक हमें ले जाती है, जहाँ हम जाना तो चाहते हैं, पर अक्सर चाहे अक्षमता के कारण या फिर किसी और कारण से वहाँ तक जा नहीं पाते, अनुभव की उस ऊँचाई तक हम पहुँच नहीं पाते। कुमार मुकुल का कवि पाठकों के लिए पूरा स्पेस मुहैया कराता है और अपने अनुभवों को खँगालने का चिन्तनपरक व सुखद अवसर देता है। आज जब कॉरपोरेट समय में चारों ओर बिल्डरों और मकानों, फ्लैट, फ्लाईओवरों और मेट्रो का हो-हल्ला मचाया जा रहा है, तब कवि की निगाह घर पर है, मकान पर नहीं; प्रेम पर है, प्रेम की बाहरी रूप-सज्जा या बनावट पर नहीं। प्रेम की सुखद ऊष्मा पर उनका ध्यान है, ऐसी ऊष्मा पर जो अभावों और वंचना के संघर्षों से प्रायः अपने-आप पैदा हो जाया करती है।
प्रेम की बात करते हुए विषमता के चित्रों का भी सामने आना स्वाभाविक ही है। तमाम विषमताओं और खाइयों की विकरालता मापतीं ये कविताएँ बिम्बों की उन ज़रूरी गलियों में हमें ले जाती हैं, जिनके बारे में जानते सभी हैं लेकिन मानने को तैयार नहीं होते। ‘मनोविनोदिनी’ नामक कविता में जो बिम्ब उभरता है, वह पाठकों के मनोमस्तिष्क पर देर तक के लिए अपना असर छोड़ जाता है। कुमार मुकुल की इन कविताओं में आशंकाओं और कयास के स्वप्न भी अतार्किक नहीं हैं, मानवीय जीवन मूल्यों के सन्दर्भ में उनकी एक गम्भीर अर्थवत्ता और विद्रूपता है। अक्सर वे काव्यात्मक कण्ट्रास्ट के सहारे प्रेम के यथार्थ को और उसके आर-पार देखने की धारदार कोशिश करते हैं। कविताओं का शिल्प सघन भाव बोध को सधी हुई भाषा में उल्लिखित करता है।
यहाँ कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि अपनी बात को सरलता से कहने और अपने स्टैण्ड को रखने का हुनर है। इसीलिए ‘हृदय’ नामक कविता में हृदय अपने जैविक-भौतिक अर्थों से बहुत परे चला जाता है। अपने सम्पूर्ण अर्थों में इस संग्रह की कविताएँ पूरी दुनिया की कविताएँ हैं, न कि किसी स्थानीय शहर, कस्बे या गाँव की और न ही किसी भावना विशेष यानी प्रेम की। प्रेम की व्याप्ति का सलीका यहाँ धीमे-धीमें पंक्तियों में उतरता है और कविताएँ एक बीहड़ यात्रापथ तय करते हुए उस बिन्दु पर आ पहुँचती हैं, जहाँ पूरे समाज का प्रेम केन्द्र में आ जाता है। कथ्य के स्तर पर तो गहरे प्रेम की गहरी कविताओं वाला यह संग्रह भीतर तक प्रभावित करता ही है, शिल्प भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे बड़ी बात तो अट्ठावन कविताओं वाले इस संग्रह में कविताओं का उपलब्ध क्रम है जो धीमे-धीमे भावनाओं की सघनता और अनुभूति की तीव्रता की मजबूत जमीन की तरफ बढ़ता जाता है। निश्चित रूप से ‘एक उर्सुला होती है’ एक पठनीय और संग्रहणीय कविता संग्रह है।
नया ज्ञानोदय के जून 2017 अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

Percept Pictures Short Film ‘Avsaad’ raises awareness for the issue of Depression on World Health Day 2017


एक उर्सुला होती है की एक कविता 'अवसाद' पर बनी शार्टफिल्‍म

On the occasion of World Health Day, Percept Pictures digital arm ‘Indian Chronicles’ launched yet another reality-based Short Film, ‘Avsaad’ focused on the topic of ‘Depression’, a challenge faced by over 300 million people around the globe. Directed by Anuradha Nishad, the film is captivatingly narrated in a poetic Hindi version. The essence of the film showcases the journey of an individual in today’s age struggling and surviving under the shadows of the mental disorder called ‘Depression’. The objective of the film is to create mass awareness of the issues and challenges faced by over 300 million people across all age groups around the world and highlight the fact that depression is a treatable condition.
The film was launched on World Health Day, celebrated on April 7 every year to mark the anniversary of the founding of the World Health Organization, with an aim to mobilize action around a specific health topic of concern to people all over the world. The theme of the 2017 World Health Day campaign is “Depression – Let’s Talk” and recognizes that depression is a treatable condition and seeks to address the fact that, despite this, about 50% of cases of major depression still go untreated.
According to the World Health Organization, the number of people living with Depression increased by over 18% between 2005 and 2015, and Depression is also the largest cause of disability worldwide. More that 80% of this disease burden is among people living in low- and middle-income countries, and almost 7.5% Indians suffer from major or minor mental disorders that require expert intervention. In October 2016, according to the National Institute of Mental Health and Neurosciences (NIMHANS) mental survey, the incidence of depression is approximately 1 in every 20 Indians. Given the scale of this issue, Percept Pictures and Anuradha Nishad decided to tackle this problem creatively head on by producing and dedicating the film ‘Avsaad’ on World Health Day to highlight this major health concern and commemorate the spirit of those who have successfully been treated and emerged from the dark shadows of Depression.
Produced and directed by Percept Pictures, this short film continues to add to their repertoire of achievements following in the footsteps of their award winning short film (aids+b)2 which won the Best Film award at the Dada Saheb Phalke Film Festival 2016, ‘Just Begun’ which received international acclaim for its sensitive portrayal and contemporary approach on the contentious LGBTQ subject matter; and ‘Speaking Pad’ which created mass awareness for the accomplishments & challenges faced by 70 million Deaf people worldwide. Percept Pictures has a rich history of accomplishments in mainstream cinema and has established a strong foothold by consistently innovating and delivering some of the biggest films and hits in the past two decades. It has created pioneering quality content in the ‘Cause Cinema’ genre with a focus on highlighting various key issues and maladies plaguing our society today.
Speaking on ‘Avsaad’ and its concept, Aditya Joshi, Senior Manager – Marketing, Percept Pictures commented, “Every third person is dealing with a globally recognized major mental disorder Depression, and even the WHO has raised this as the key focus area for 2017. Given the scale of the problem we decided it was high time to tackle this sensitive issue and create a unique film which explores this area in a delicate yet practical manner. The key to dealing with depression lies in your own hands, and we wanted to highlight the fact that Depression is a fully treatable medical condition. We hope that ’Avsaad’ creates the required buzz to reach out to both patients of Depression and their families searching for a beacon of hope.”
Anuradha Nishad, Director, ‘Avsaad’ said, “Depression alone accounts for over 7% of the total disease burden in India. But we never address it because most of our families and friends don’t believe it exists or simply suppress it out of sheer fear of social stigma. I too have suffered from depression for a while and it wasn’t possible for me to express verbally or share how it really felt with anyone. I therefore struck upon the creative idea of creating memorable stark visuals to my words and presenting a unique short film that could depict the issues, loneliness and tribulations faced by people battling depression.”
‘Avsaad’ is viewable on Percept Pictures YouTube page, “Indian Chronicles”, a digital channel dedicated to enabling and empowering the youth to express themselves. Over the past year Percept Pictures has become a nurturing ground for young aspiring creative talent and ‘Indian Chronicles’ offers an opportunity and platform for young budding creative talents across India to showcase their skills and voice their opinions in a creative manner across any topic that is close to their heart. What makes ‘Avsaad’ special is that the entire cast and crew are all young and represent the voice and skills of ‘Gen-Next’.
Added Aditya Joshi, “Indian Chronicles offers a platform for the youth to express themselves. A decade ago there were no opportunities for the youth to voice their views. And it was this gap area in the industry that gave birth to Indian Chronicles. The youth today are intellectual, enthusiastic and have a passionate desire to make a positive contribution to society. Digital platforms like Indian Chronicles offers young storytellers like Anuradha the opportunity to present their thoughts and feelings in an honest and unrestricted manner.”
Commenting on her first film venture with Percept Pictures digital arm Indian Chronicles Anuradha Nishad added, “To all the young promising artists out there, Indian Chronicles is a platform built specifically for you. I aim to bring many more such inspiring and eye opening stories through this platform, and I hope that Gen Next uses this channel to showcase their creative talents, views and opinions to create a better future.”

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

अँधकार के बाद लौटकर आती सुबह जैसी कविताएँ ■ शहंशाह आलम

चर्चित किताब : बयालीस

'एक उर्सुला होती है' ( कुमार मुकुल ) :

           इससे पहले भी युद्घ हुए थे
           पिछला युद्ध जब ख़त्म हुआ
           तब कुछ विजेता बने और कुछ विजित
           विजितों के बीच आम आदमी भूखों मरा
           विजेताओं के बीच भी मरा वह भूखा ही।
                                                     ◆ बर्तोल्त ब्रेख़्त

कुमार मुकुल को मैं जब से जानता हूँ, तब उनका अख़बार वाला जीवन था, संघर्ष था, तीक्ष्ण दृष्टि थी। उनके जीवन का यह सबकुछ जानकर ही उस प्रतिष्ठित अख़बार ने उन्हें ख़ासकर साहित्य का पन्ना देखने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। उनके जीवन के जिस पक्ष से लिखने-पढ़ने वाले प्रभावित होते रहे हों, मैं उनके कवि को बेहद उल्लेखनीय मानता था। उनका कवि तब भी न किसी विजेता, न किसी विजित के पक्ष में था, न आज, जब उनका अभी-अभी आया 'एक उर्सुला होती है' कविता-संग्रह के बहाने एक अरसे बाद मिलना संभव हुआ। दरअसल कुमार मुकुल आम आदमी के हिस्से के कवि मुझे अब भी लगे। आम आदमी के होंठ जब सूखते हैं, पतझड़ के पत्ते जैसे, कुमार मुकुल उन सूखे होंठों पर अपनी शिष्ट-शालीन कविताएँ धर देते हैं। आम आदमी के पीले पड़ चुके होंठों को देश की सरकारें कुछ दें, न दें, एक कवि उसी की मर्यादा से बँधा, अपनी कविताएँ दे ही सकता है। यह बंधान कुमार मुकुल कभी नहीं भूलते। उनकी कविता-यात्रा से मैंने यही समझा है। कुमार मुकुल राइनेर मारिया रिल्के के लिए एक कविता लिखते हुए कहते हैं : चीज़ों को सरलीकृत मत करो / अर्थ मत निकालो / हर बात के मानी नहीं होते / चीज़ें होती हैं अपनी संपूर्णता में बोलती हुईं / हर बार / उनका कोई अर्थ नहीं होता ( 'उड़ान हूँ मैं', पृ. 10 )। कुमार मुकुल अपने समय के उन कवियों में हैं, जिन्होंने जनता के पक्ष में बेहद आक्रामक होकर कभी नहीं लिखा। जो लिखा नियंत्रण में रहकर लिखा। लेकिन लिखा उन्हीं के पक्ष का, जिनके साथ अपनी प्रार्थनाओं को आकाश के उस तल तक भेजते रहे, जो नया है, मूल्यवान है और जहाँ प्रार्थनाएँ सुनी जाती रही हैं। जबकि वक़्त इतना कठिन है कि अब कोई किसी को अपनी प्रार्थना तक में शरीक नहीं करना चाहता। एक कवि ऐसा अमूमन नहीं करता। यही वजह है कि कुमार मुकुल अपने समय को बेहद, बेहद बारीकी से पकड़कर रखने वाले कवि हैं। अपने समय को भाषा के जिस नए संस्कार में ढालकर हमारे समक्ष लाते हैं, वह हमारे लिए उत्कृष्ट है। यह कहा जा सकता है कि कुमार मुकुल की कविताएँ एक ऐसी भाषा को तरतीब दे रही हैं, श्रृंखलाबद्ध कर रही हैं, जो बारिश में नहा-धोकर देश के उल्लेखनीय कवियों की भाषा के साथ खड़ी दिखाई देती हैं यानी कुमार मुकुल की कविताएँ देश की समकालीन हिंदी कविता के व्यापक संसार में सहेजकर रखी जा सकती हैं। 

     कुमार मुकुल की कविताओं के नायाब होने का असली रहस्य यही कि कुमार मुकुल अपने समय को अपने भीतर पैबस्त टेलिस्कोप से देखते रहे हैं। कवि के इस टेलिस्कोप से सम्पूर्ण देश हम भी देख सकते हैं। कुमार मुकुल की ये कविताएँ पढ़ने पर हमसे छीन ली गई हमारी तारीख़ और तवारीख़ तक का हिसाब रखती हुई दिखाई पड़ती हैं। कुमार मुकुल के पास ज़िंदगी को, अपनी मुहब्बत को भी, देखने का अपना उसूल है। यह उसूल दो टूक कहने वाला कोई कवि ही रख सकता है। मेरी नज़र में कुमार मुकुल उन कवियों में शुमार किए जाते हैं, जो अपने समय को लेकर दो टूक शब्दों में सारा कुछ कह जाते हैं। किसी कवि की यही दो टूक कहने वाली अदा से उस कवि के भीतर की आग के बारे में पता चलता है। कुमार मुकुल के भीतर रह रही आग उनके जीवन-संघर्ष को बख़ूबी प्रकट करती है। दरअसल कुमार मुकुल, जनतंत्र के नाम पर आदमी को जिस तरह छला और ठगा जा रहा है, उस छल को और उस ठगई को बग़ैर किसी लाग-लपेट के अपनी कविताओं में रखते हैं। और यह जनतंत्र, वैसा वाला जनतंत्र है भी नहीं, जो जनतंत्र हमें सुकून देता था। आज का नया वाला जनतंत्र 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' से ठीक उलट है, विपरीत है, प्रतिकूल है। इस नए वाले जनतंत्र में एक ख़ास वर्ग को ख़ास तरीक़े से डराया, रुलाया, उलझाया जा रहा है। इस ख़ास वर्ग को कैसे रोटी नहीं मिले, कैसे कपड़ा नहीं मिले, कैसे मकान नहीं मिले, हर सत्ताधीश इसी फ़िक्र, इसी चिन्तन में मरा जा रहा है। यह ख़ास वर्ग वही वर्ग है, जो शोषित है, वंचित है। जिसके मुँह में बोली नहीं है। कुमार मुकुल एक सच्चा कवि होने के नाते सच्चे जनतंत्र की फ़िक्र करते रहे हैं और सत्ताधीशों के नापाक इरादे को भाँपते भी रहे हैं। यह सच ही तो है, जब मुल्क में डुप्लीकेट खाने-पीने के सामान से लेकर डुप्लीकेट संविधान तक बेचा जाने लगा है, तो कवि के पास सिवाय विरोध करने के और बच क्या जाता है : यह लिखते / कितनी शर्म आएगी / कि मैंने कष्ट सहे / मुझे जीवन / ऐसा ही चाहिए था / अपने मुताबिक़ / अपनी ग़लतियों से / सजा-धजा ( 'मुझे जीवन ऐसा ही चाहिए था', पृ. 9 )। यह हमारे जीवन का छल ही तो है, जिस जीवन को हम अपने मुताबिक़ जी नहीं सके, उसे ही सजा-धजाकर जीवन में उतारने पर मजबूर हैं। सच कहिए तो यह सब करना एक कवि के समय का नौहा ( शोकगीत ) न होकर उस जनतंत्र का नौहा है, जिस जनतंत्र को राजनीति के ठगों, जेबकतरों, गिरहकटों ने पूरी बेशर्मी से अपने हिस्से का मानकर अपने पास रख लिया है। यह मुल्क के लिए ऐसी दुर्घटना है, जिसमें अपने मुल्क का चेहरा लहूलुहान दिखाई दे रहा है। और इस लहूलुहान चेहरे की ब्रांडिंग कुछ इस तरह की जा रही है, जैसे मुल्क का यही चेहरा देवत्व से भरा चेहरा हो। अंग्रेज़ी राज के वक़्त जिस तरह से हमें सताया-रुलाया जाता रहा होगा, ऐसा करने के लिए शोषित को प्रवृत्त किया जाता रहा होगा, कमोबेश वही नज़ारा आज देखने को मिल रहा है। हम क्या खाएँ, कैसा खाएँ। हम क्या पहनें, कैसा पहनें। हम कितने बच्चे पैदा करें या फिर बच्चे ही पैदा क्यों करें। ये सब एक वर्ग दूसरे वर्ग के लिए आज कर-कह रहा है। ग़ज़ब के लोग हैं ऐसा करने-कहने वाले। उन्हें ऐसा करते-कहते शर्म भी अब नहीं आती। अफ़सोस, ऐसा माहौल पढ़े-लिखे ज़्यादा बना रहे हैं। यह पढ़ा-लिखा तबक़ा यह सब राष्ट्रहित में कहता हुआ करता है। यह गुत्थी कब सुलझेगी, कौन सुलझाएगा, कोई नहीं जानता। जो डर-डरकर जी रहा है, अपना दुःख वही बताता रहा है : खिड़की के पार / एक सितारा है / धुँधलाता-सा / और झींगुरों का समवेत स्वर है / मुक़ाबिल उस चुप्पी के / जो व्याप्त है / अंतरजगत में मेरे ( 'मुक़ाबिल उस चुप्पी के', पृ. 14 )।
     कुमार मुकुल की कविताई की ख़ासियत यही है कि कवि जो लिखता है सच लिखता है। समय जो हो, परिस्थिति जो हो, आगा-पीछा जो है, कवि सच लिखता है। सियाह को सियाह, सफ़ेद को सफ़ेद लिखता है। पतझड़ को वसंत लिखा भी नहीं जाना चाहिए। झूठ लिखने से कविता की रंगत बिगड़ती है। कुमार मुकुल कविता की असली रंगत बचाए रखना जानते हैं। यही वजह है कि उनके गिर्दो-पेश जो तारीख़ और तवारीख़ उभरकर सामने आती है, उसी तारीख़ और तवारीख़ के बारे में वे लिखते हैं। मुझसे पूछिए तो 'एक उर्सुला होती है' की कविताएँ हमारी उदासी को इस तरह भगाती हैं जैसे सुबह का सूरज रात के अँधेरे को भगाता रहा है। आप कुमार मुकुल की कोई कविता उठा लीजिए, हर कविता में धूप का टुकड़ा जीवन के अँधेरे को भगाने के लिए छिपकर बैठा मिलेगा। संग्रह की लगभग सारी कविताएँ वॉन गॉग की पेंटिग्स की तरह हैं, जिनमें एक नया रहस्य हर तरफ़ दिखाई देता है। यही वजह है कि कुमार मुकुल की किताब के नाम में ही वॉन गॉग की 'उर्सुला' को प्रमुखता से लिया गया है। सच यही है कि कुमार मुकुल की बेचैनी एक कवि की अमरता पाने के लिए न होकर समकालीन कविता को विस्तार देने के प्रति उनकी ललक ज़्यादा है। यही वजह है कि कुमार मुकुल कई कवियों की तरह अपनी कविताओं का वावैला नहीं मचवाते, हँगामा खड़ा नहीं करवाते, हो-हल्ला नहीं मचवाते। कुमार मुकुल के बारे में मेरी राय यही है कि कुमार मुकुल उन कवियों में हैं, जो बिना किसी हीला-हवाला के कविता की जड़ों को खाद-पानी देते हुए अपनी कविताई का जादू दिखा रहे हैं। यही वजह है कि कवियों की उलट-पुलट से कुमार मुकुल बचे हुए हैं और बग़ैर किसी जुनूँ के यानी बिना किसी उन्माद के समकालीन कविता को एक नए स्वाद की कविताएँ सौंप रहे हैं। संग्रह की 'अमरता का यह श्राप, 'एक अच्छी-सी लड़की', 'छातियों का कहन', 'हवाओं की तरह', 'तुम्हारी ट्रेन चली जा रही है', 'पचासों मील चलकर', 'अपने कवि होने की बुनियाद', 'हमें उस पर विश्वास है', 'कि आकाश भी एक पाताल ही है', 'बस फिर-फिर आघात', 'उदासी के साथ अकेले', 'कहीं कोई उदास गाता है', 'नदी और किनारे की तरह', 'यह बेचैनी ही अमरता है', 'गीत : एक, दो, तीन', 'अवसाद', 'वॉन गॉग की उर्सुला', 'उम्र के भीतर अमरता', 'स्थिर किए' आदि किए कविताएँ आप पढ़ जाइये और देखिए कि ये कविताएँ आदमी के ख़्वाब को कैसे ज़िंदा रखना जानती हैं। किताबों के अच्छे ख़रीददार आप हैं तो यह किताब आप ज़रूर ख़रीदकर पढ़िए। इसलिए कि कुमार मुकुल की ये कविताएँ जितनी उनके प्रेम की कविताएँ हैं, उससे कहीं ज़्यादा किसी आरा मशीन में आदमी को काटे जाने की गवाही देती कविताएँ हैं। कुमार मुकुल का लबो-लहजा इतना बढ़िया है कि इस लबो-लहजे की बहुत कम कविताएँ छपकर इन दिनों आ रही हैं। कुमार मुकुल की ये कविताएँ किसी अच्छे संगीत की तरह आपमें अपनी जगह बना लेंगी, इसको लेकर मुझे कोई संदेह नहीं है।
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एक उर्सुला होती है ( कविता-संग्रह ) / कवि : कुमार मुकुल / प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ़-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, ग़ाज़ियाबाद-201005 / आवरण : वॉन गॉग / मूल्य : 230 ₹ / मोबाइल संपर्क : 09871856053

समीक्षक संपर्क : 
शहंशाह आलम
हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक
नोहसा रोड, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार
09835417537

मुखर बौद्धिक कवि : कुमार मुकुल ... कृष्ण समिद्ध

( आज मुकुल जी को दुसरी बार सुना...मुझे उनके स्वेत धवल बालों से जलन हैं...वो मुझे भी चाहिए था .)
कविता तब दीर्घजीवी होती है ....जब समय को लांघकर बार बार प्रासंगिक बनी रहे और कुमार मुकुल की कविता ऐसी ही है....
" आफिसिअल समोसों पर
पलनेवाले चूहे
मालिक के आलू के बोरों को काटते हुए
सोचते हैं
कि दांत पजाते वर्षों हो गये
पर अपने सेठ का कुछ बिगड़ता नहीं "
                        पर कुमार मुकुल मूलतः मुझे मुखर बौद्धिक कवि लगते हैं. मुखर इसलिए कि वो सबकुछ कह देना चाहते हैं..... उनकी कविता में हर विषय आ ही जाते हैं और बौद्धिक इसलिए कि वह हर विषय पर अपना निष्कर्ष भी देते चलते हैं..... वो जब प्रेम पर भी बात करते हैं तो उनकी सोच ...उनका निष्कर्ष वहाँ भी रहता है.
 " इजाडोरा कहती है -
प्रेम
शरीर की नहीं
आत्माक की बीमारी है "
(वॉन गॉग की उर्सुला)
                           2013 में कुमार मुकुल का 'अंधेरे में कविता के रंग' नामक काव्यालोचना का आना कोई आश्चर्य नहीं बल्कि उनका स्वाभाविक विकासमात्र है.... उनकी कविता में ...शुरू से ही ...उनका मुखर वक्तव्य काव्यालोचना गढ़ती रही है. कहुँ तो उनका पत्रकार कविता लिखते वक्त चुप नहीं बैठता ....बल्कि वो सब कुछ बोल देना चाहता है जो आज की पत्रकारिता में कह पाना बहुत संभव नहीं है. उनकी खुली घोषणा है...उनके कवि होने की बुनियाद .....दर्द की ठीस को संभालना है.......
"कि हमारा रिश्ता ही दर्द का है
जिसकी टीस को
जब संभाल लेती है मेरी कविता
तब कविता का महान व्योपार
कर पाती है वह"
( अपने कवि होने की बुनियाद )
और उनकी नज़र से दर्द छुपता भी नहीं है. अपनी कविता की भाषा के सीमित होने का दर्द भी उनकी चिंता में शामिल है.
" गुलाम हो चुकी भाषा के व्याकरण को "
या सामाजिक प्रश्न पर भी जड़ तक जाते हैं
"हम इतने एक से हैं
कि आपसी घृणा ही
हमारी पहचान बना पाती है"
(मैं हिन्दूा हूँ )
               कुमार मुकुल की दर्द बयाँ करनी की बेचैनी .... उस पर वक्तव्य देते जाने की धुमिल वाली मुखरता ...उनकी बड़ी ताकत है. जब भी इस समय का हिसाब किया जायेगा ... कुमार मुकुल की कविता सक्षम स्रोत होगी. पर यही ताकत कई जगह उनकी सीमा भी बन जाती है....और कभी कभी वो ज्यादा कह जाते हैं ...
.....कुमार मुकुल मुझे वहाँ पसंद आते हैं ....जहाँ उनके मुखर वक्तव्य थोड़ा आराम करते हैं और उनका व्यक्तित्व सामने आता है.. और जब नेट चैट पर इंतजार करते प्रेम कविता लिखते हैं.....तब उनका बौद्धिक वक्तव्य जीवन प्रेम की ऊष्मा के साथ घुलमिल कर चौंकाने वाली दृष्टि के साथ सामने आती है.
"दुनिया के क्रूरतम तानाशाह भी
अपने भीतर समेटते रहते हैं
एक बिखरती उर्सुला "
(वॉन गॉग की उर्सुला )      
            .…......तानाशाह भी तानाशाह न होते जो उनकी उर्सुला न बिखरती..... तानाशाह को इस अनुभूति से देख पाने का साहस और बिंब बेजोड़ है......साथ ही प्रेम के महत्व को बताता ही है.
और जीवन का यह बिंब भी मेरे साथ कई दिनों तक रहा......
नदी में पानी नहीं
फिर भी यह पुल
पुल है
( नदी और पुल )
             नया संग्रह ' एक उर्सुला होती है' प्रमाण है कि कवि कुमार मुकुल का विकास जारी है और वह अपनी सीमाएं लांघ रहें हैं. यह संग्रह पढ कर आनंद आयेगा. और मुझे इंतजार रहेगा जब कुमार मुकुल शमशेर की तरह सहज विकास कर सामने आयेंगें. और तब कुमार मुकुल बड़े कवि होंगे.
बकौल उनके
"होशो - हवाश के मिरे क्या कहने , 
सिराने मीर था जो पैताने कबीर जा बैठा। "