राजस्‍थान पत्रिका

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गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

अँधकार के बाद लौटकर आती सुबह जैसी कविताएँ ■ शहंशाह आलम

चर्चित किताब : बयालीस

'एक उर्सुला होती है' ( कुमार मुकुल ) :

           इससे पहले भी युद्घ हुए थे
           पिछला युद्ध जब ख़त्म हुआ
           तब कुछ विजेता बने और कुछ विजित
           विजितों के बीच आम आदमी भूखों मरा
           विजेताओं के बीच भी मरा वह भूखा ही।
                                                     ◆ बर्तोल्त ब्रेख़्त

कुमार मुकुल को मैं जब से जानता हूँ, तब उनका अख़बार वाला जीवन था, संघर्ष था, तीक्ष्ण दृष्टि थी। उनके जीवन का यह सबकुछ जानकर ही उस प्रतिष्ठित अख़बार ने उन्हें ख़ासकर साहित्य का पन्ना देखने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। उनके जीवन के जिस पक्ष से लिखने-पढ़ने वाले प्रभावित होते रहे हों, मैं उनके कवि को बेहद उल्लेखनीय मानता था। उनका कवि तब भी न किसी विजेता, न किसी विजित के पक्ष में था, न आज, जब उनका अभी-अभी आया 'एक उर्सुला होती है' कविता-संग्रह के बहाने एक अरसे बाद मिलना संभव हुआ। दरअसल कुमार मुकुल आम आदमी के हिस्से के कवि मुझे अब भी लगे। आम आदमी के होंठ जब सूखते हैं, पतझड़ के पत्ते जैसे, कुमार मुकुल उन सूखे होंठों पर अपनी शिष्ट-शालीन कविताएँ धर देते हैं। आम आदमी के पीले पड़ चुके होंठों को देश की सरकारें कुछ दें, न दें, एक कवि उसी की मर्यादा से बँधा, अपनी कविताएँ दे ही सकता है। यह बंधान कुमार मुकुल कभी नहीं भूलते। उनकी कविता-यात्रा से मैंने यही समझा है। कुमार मुकुल राइनेर मारिया रिल्के के लिए एक कविता लिखते हुए कहते हैं : चीज़ों को सरलीकृत मत करो / अर्थ मत निकालो / हर बात के मानी नहीं होते / चीज़ें होती हैं अपनी संपूर्णता में बोलती हुईं / हर बार / उनका कोई अर्थ नहीं होता ( 'उड़ान हूँ मैं', पृ. 10 )। कुमार मुकुल अपने समय के उन कवियों में हैं, जिन्होंने जनता के पक्ष में बेहद आक्रामक होकर कभी नहीं लिखा। जो लिखा नियंत्रण में रहकर लिखा। लेकिन लिखा उन्हीं के पक्ष का, जिनके साथ अपनी प्रार्थनाओं को आकाश के उस तल तक भेजते रहे, जो नया है, मूल्यवान है और जहाँ प्रार्थनाएँ सुनी जाती रही हैं। जबकि वक़्त इतना कठिन है कि अब कोई किसी को अपनी प्रार्थना तक में शरीक नहीं करना चाहता। एक कवि ऐसा अमूमन नहीं करता। यही वजह है कि कुमार मुकुल अपने समय को बेहद, बेहद बारीकी से पकड़कर रखने वाले कवि हैं। अपने समय को भाषा के जिस नए संस्कार में ढालकर हमारे समक्ष लाते हैं, वह हमारे लिए उत्कृष्ट है। यह कहा जा सकता है कि कुमार मुकुल की कविताएँ एक ऐसी भाषा को तरतीब दे रही हैं, श्रृंखलाबद्ध कर रही हैं, जो बारिश में नहा-धोकर देश के उल्लेखनीय कवियों की भाषा के साथ खड़ी दिखाई देती हैं यानी कुमार मुकुल की कविताएँ देश की समकालीन हिंदी कविता के व्यापक संसार में सहेजकर रखी जा सकती हैं। 

     कुमार मुकुल की कविताओं के नायाब होने का असली रहस्य यही कि कुमार मुकुल अपने समय को अपने भीतर पैबस्त टेलिस्कोप से देखते रहे हैं। कवि के इस टेलिस्कोप से सम्पूर्ण देश हम भी देख सकते हैं। कुमार मुकुल की ये कविताएँ पढ़ने पर हमसे छीन ली गई हमारी तारीख़ और तवारीख़ तक का हिसाब रखती हुई दिखाई पड़ती हैं। कुमार मुकुल के पास ज़िंदगी को, अपनी मुहब्बत को भी, देखने का अपना उसूल है। यह उसूल दो टूक कहने वाला कोई कवि ही रख सकता है। मेरी नज़र में कुमार मुकुल उन कवियों में शुमार किए जाते हैं, जो अपने समय को लेकर दो टूक शब्दों में सारा कुछ कह जाते हैं। किसी कवि की यही दो टूक कहने वाली अदा से उस कवि के भीतर की आग के बारे में पता चलता है। कुमार मुकुल के भीतर रह रही आग उनके जीवन-संघर्ष को बख़ूबी प्रकट करती है। दरअसल कुमार मुकुल, जनतंत्र के नाम पर आदमी को जिस तरह छला और ठगा जा रहा है, उस छल को और उस ठगई को बग़ैर किसी लाग-लपेट के अपनी कविताओं में रखते हैं। और यह जनतंत्र, वैसा वाला जनतंत्र है भी नहीं, जो जनतंत्र हमें सुकून देता था। आज का नया वाला जनतंत्र 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' से ठीक उलट है, विपरीत है, प्रतिकूल है। इस नए वाले जनतंत्र में एक ख़ास वर्ग को ख़ास तरीक़े से डराया, रुलाया, उलझाया जा रहा है। इस ख़ास वर्ग को कैसे रोटी नहीं मिले, कैसे कपड़ा नहीं मिले, कैसे मकान नहीं मिले, हर सत्ताधीश इसी फ़िक्र, इसी चिन्तन में मरा जा रहा है। यह ख़ास वर्ग वही वर्ग है, जो शोषित है, वंचित है। जिसके मुँह में बोली नहीं है। कुमार मुकुल एक सच्चा कवि होने के नाते सच्चे जनतंत्र की फ़िक्र करते रहे हैं और सत्ताधीशों के नापाक इरादे को भाँपते भी रहे हैं। यह सच ही तो है, जब मुल्क में डुप्लीकेट खाने-पीने के सामान से लेकर डुप्लीकेट संविधान तक बेचा जाने लगा है, तो कवि के पास सिवाय विरोध करने के और बच क्या जाता है : यह लिखते / कितनी शर्म आएगी / कि मैंने कष्ट सहे / मुझे जीवन / ऐसा ही चाहिए था / अपने मुताबिक़ / अपनी ग़लतियों से / सजा-धजा ( 'मुझे जीवन ऐसा ही चाहिए था', पृ. 9 )। यह हमारे जीवन का छल ही तो है, जिस जीवन को हम अपने मुताबिक़ जी नहीं सके, उसे ही सजा-धजाकर जीवन में उतारने पर मजबूर हैं। सच कहिए तो यह सब करना एक कवि के समय का नौहा ( शोकगीत ) न होकर उस जनतंत्र का नौहा है, जिस जनतंत्र को राजनीति के ठगों, जेबकतरों, गिरहकटों ने पूरी बेशर्मी से अपने हिस्से का मानकर अपने पास रख लिया है। यह मुल्क के लिए ऐसी दुर्घटना है, जिसमें अपने मुल्क का चेहरा लहूलुहान दिखाई दे रहा है। और इस लहूलुहान चेहरे की ब्रांडिंग कुछ इस तरह की जा रही है, जैसे मुल्क का यही चेहरा देवत्व से भरा चेहरा हो। अंग्रेज़ी राज के वक़्त जिस तरह से हमें सताया-रुलाया जाता रहा होगा, ऐसा करने के लिए शोषित को प्रवृत्त किया जाता रहा होगा, कमोबेश वही नज़ारा आज देखने को मिल रहा है। हम क्या खाएँ, कैसा खाएँ। हम क्या पहनें, कैसा पहनें। हम कितने बच्चे पैदा करें या फिर बच्चे ही पैदा क्यों करें। ये सब एक वर्ग दूसरे वर्ग के लिए आज कर-कह रहा है। ग़ज़ब के लोग हैं ऐसा करने-कहने वाले। उन्हें ऐसा करते-कहते शर्म भी अब नहीं आती। अफ़सोस, ऐसा माहौल पढ़े-लिखे ज़्यादा बना रहे हैं। यह पढ़ा-लिखा तबक़ा यह सब राष्ट्रहित में कहता हुआ करता है। यह गुत्थी कब सुलझेगी, कौन सुलझाएगा, कोई नहीं जानता। जो डर-डरकर जी रहा है, अपना दुःख वही बताता रहा है : खिड़की के पार / एक सितारा है / धुँधलाता-सा / और झींगुरों का समवेत स्वर है / मुक़ाबिल उस चुप्पी के / जो व्याप्त है / अंतरजगत में मेरे ( 'मुक़ाबिल उस चुप्पी के', पृ. 14 )।
     कुमार मुकुल की कविताई की ख़ासियत यही है कि कवि जो लिखता है सच लिखता है। समय जो हो, परिस्थिति जो हो, आगा-पीछा जो है, कवि सच लिखता है। सियाह को सियाह, सफ़ेद को सफ़ेद लिखता है। पतझड़ को वसंत लिखा भी नहीं जाना चाहिए। झूठ लिखने से कविता की रंगत बिगड़ती है। कुमार मुकुल कविता की असली रंगत बचाए रखना जानते हैं। यही वजह है कि उनके गिर्दो-पेश जो तारीख़ और तवारीख़ उभरकर सामने आती है, उसी तारीख़ और तवारीख़ के बारे में वे लिखते हैं। मुझसे पूछिए तो 'एक उर्सुला होती है' की कविताएँ हमारी उदासी को इस तरह भगाती हैं जैसे सुबह का सूरज रात के अँधेरे को भगाता रहा है। आप कुमार मुकुल की कोई कविता उठा लीजिए, हर कविता में धूप का टुकड़ा जीवन के अँधेरे को भगाने के लिए छिपकर बैठा मिलेगा। संग्रह की लगभग सारी कविताएँ वॉन गॉग की पेंटिग्स की तरह हैं, जिनमें एक नया रहस्य हर तरफ़ दिखाई देता है। यही वजह है कि कुमार मुकुल की किताब के नाम में ही वॉन गॉग की 'उर्सुला' को प्रमुखता से लिया गया है। सच यही है कि कुमार मुकुल की बेचैनी एक कवि की अमरता पाने के लिए न होकर समकालीन कविता को विस्तार देने के प्रति उनकी ललक ज़्यादा है। यही वजह है कि कुमार मुकुल कई कवियों की तरह अपनी कविताओं का वावैला नहीं मचवाते, हँगामा खड़ा नहीं करवाते, हो-हल्ला नहीं मचवाते। कुमार मुकुल के बारे में मेरी राय यही है कि कुमार मुकुल उन कवियों में हैं, जो बिना किसी हीला-हवाला के कविता की जड़ों को खाद-पानी देते हुए अपनी कविताई का जादू दिखा रहे हैं। यही वजह है कि कवियों की उलट-पुलट से कुमार मुकुल बचे हुए हैं और बग़ैर किसी जुनूँ के यानी बिना किसी उन्माद के समकालीन कविता को एक नए स्वाद की कविताएँ सौंप रहे हैं। संग्रह की 'अमरता का यह श्राप, 'एक अच्छी-सी लड़की', 'छातियों का कहन', 'हवाओं की तरह', 'तुम्हारी ट्रेन चली जा रही है', 'पचासों मील चलकर', 'अपने कवि होने की बुनियाद', 'हमें उस पर विश्वास है', 'कि आकाश भी एक पाताल ही है', 'बस फिर-फिर आघात', 'उदासी के साथ अकेले', 'कहीं कोई उदास गाता है', 'नदी और किनारे की तरह', 'यह बेचैनी ही अमरता है', 'गीत : एक, दो, तीन', 'अवसाद', 'वॉन गॉग की उर्सुला', 'उम्र के भीतर अमरता', 'स्थिर किए' आदि किए कविताएँ आप पढ़ जाइये और देखिए कि ये कविताएँ आदमी के ख़्वाब को कैसे ज़िंदा रखना जानती हैं। किताबों के अच्छे ख़रीददार आप हैं तो यह किताब आप ज़रूर ख़रीदकर पढ़िए। इसलिए कि कुमार मुकुल की ये कविताएँ जितनी उनके प्रेम की कविताएँ हैं, उससे कहीं ज़्यादा किसी आरा मशीन में आदमी को काटे जाने की गवाही देती कविताएँ हैं। कुमार मुकुल का लबो-लहजा इतना बढ़िया है कि इस लबो-लहजे की बहुत कम कविताएँ छपकर इन दिनों आ रही हैं। कुमार मुकुल की ये कविताएँ किसी अच्छे संगीत की तरह आपमें अपनी जगह बना लेंगी, इसको लेकर मुझे कोई संदेह नहीं है।
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एक उर्सुला होती है ( कविता-संग्रह ) / कवि : कुमार मुकुल / प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ़-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, ग़ाज़ियाबाद-201005 / आवरण : वॉन गॉग / मूल्य : 230 ₹ / मोबाइल संपर्क : 09871856053

समीक्षक संपर्क : 
शहंशाह आलम
हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक
नोहसा रोड, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार
09835417537

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