राजस्‍थान पत्रिका

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गुरुवार, 8 जून 2017

सृजनात्‍मक जिजीविषा और जिगीषा का प्रतीक 'उर्सुला' - अनिल अनलहातु


हर रचनात्‍मक यात्रा में सहजीवन के रूप में किसी न किसी 'उर्सुला' की मौजूदगी अवश्‍य रहती है, इस संग्रह की कविताएं इसी बात की तस्‍दीक करती हैं। इस तरह कुमार मुकुल वॉन गॉग की 'उर्सुला' को एक प्रतीक में बदल देते हैं, उर्सुला जो प्रतीक है सृजनात्‍मक जीजिविषा और जिगीषा की। हर रचनाकार ओर कलाकार की जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब वह अपने रचनात्‍मक जीवन के चरम से गुजरता हुआ जीवन संघर्ष के थपेड़ों से जूझत है ऐसे में कोई 'उर्सुला' होती है जो उसके मानस को एक ढ़ाढस की तरह संबल प्रदान करती है। कहना न होगा कि यह वी उर्सुला है जो प्रसाद की कामायनी में मनु को श्रद्धा के रूप में मिलती है और उसके तुमुल कोलाहल से भरे जीवन में हृदय की बात की तरह राहत देती है।

कुछ इसी तरह बांगला कवि जीवनानंद दास ने भी अपनी कविताओं में उर्सुला को तलाशा है नाटर की वनलता सेन के रूप में।

' रात रात भर अंधकार में मैं भटका हूं

अशोक और बिम्‍बसार के धूसर लगते संसारों में

दूर समय में और दूर अंधकार में

मैं थका हुआ हूं -

चारों ओर बिछा जीवन के ही समुद्र का फेन

शांति किसी ने दी तो वह थी

नॉटर की वनलता सेन।

तो हर रचनाकार और कलाकार को उसके अंधेरे बंद कमरों से बाहर निकालती है एक उर्सुला एक वनलता सेन।

ये उर्सुलाएं जितनी बाहरी दुनिया में होती हैं उतनी ही भीतरी दुनिया में भी। बाजवक्‍त में कवियेां की खामख्‍याली में भी रहती हैं। जैसे आग्‍न्‍येष्‍का सोनी मुक्तिबोध के अंधेरे में विचरण करती रहती है जैसा कि रामविलास शर्मा कहते हैं। कवि लिखता है -

और होता है वह

एक विन्सेंट ही

ख़्याल को सनम समझता

ख़ुद को

ख़्याल से भी कम समझता

ये उर्सुलाएं यथार्थ के ऐंद्रिक धरातल पर जितनी होती हैं उसे अधिक अभौतिक और अशरीरी धरातल पर -

प्रेम शरीर की नहीं

आत्मा की बीमारी है

यह ज्वर जला डालता है सारे कलुष

प्रेमी बन जाते हैं

योद्धा पादरी शिक्षक

कवि का अभिप्रेत है कि यह प्रेम-ज्‍वर बना रहे सतत, क्‍येांकि यह ज्‍वर भर जाता है, आंखों में चमक, भाषा में खुनक और फिर तमाम विंसेंटों के भीतर उनकी उर्सुलाएं जाग पड़ती हैं, यहां तक कि -

दुनिया के क्रूरतम तानाशाह भी

अपने भीतर समेटते रहते हैं

एक बिखरती उर्सुला

ईवा ब्राउन और क्‍लारा पेताची को इन संदर्भों में देखा जा सकता है।

इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में ऐसी ही उर्सुलाएं रचे जाकर आकार पाती हैं।

कई कविताओं में कवि खामख्‍याली से निकलकर प्रेम के ठोस व ऐंद्रिक धरातल पर पूरी धज के साथ यात्रा करता है। जहां प्रेम, मृत्‍यु के साथ खत्‍म नहीं होता वह अपनी उदात्‍तता में मातृत्‍व में आकाश तलाशने लगता है -

वह

जो प्रेम करती है मुझे

कामना करती है अक्सर मेरी मृत्यु की

वह सोचती है

कि मैं मर जाउं एक बार

तो फिर से जिला लेगी वह

नये सिरे से

और साधिकार ले चलेगी

अंगुली पकड कर

नन्हें बालक.सा

अपने पीछे पीछे!

प्रेम की यह उदात्‍तता, गांधी और कस्‍तूरबा के परिपक्‍व प्रेम की ओर ईशरा करता है, जहां प्रेम ममत्‍व में तब्‍दील होता दिखता है।

कुमार मुकुल की कविताओं में प्रेम के कई शेड्स हैं। बड़े कैनवस पर प्रेम के इतने बहुविध चित्र कवि ने उकेरे हैं कि आप विस्मित हो जाते हैं। इन कविताओं की तन्‍मयता साथ बहा ले जाती है। कुछ कविताओं में जहां ममत्‍व में प्रेम अपनी सार्थकता और अमरता तलाशता है वहीं अन्‍य कविताओं में वह उससे एक साथीपने की उम्‍मीद भी करता है -

कि इस तरह वह

गोइंया सी

मेरे कंधों से लगकर चले।

ताकि दोनेां के जीवन एकाकार हो जाएं और उनके स्‍वप्‍न एक दूसरे की आंखों में पलें। क्‍योंकि -

उनकी संयुक्‍त हंसी से उद्भासित

सुबहें हैं उसमें

और

अंकवार. भर भर जिया गया

जीवन है

और शामें हैं

तेज भागती

अंधेरा करती जुल्फों को झटकती रातें

कि अकडती पीठ पर

धंसती हैं उंगलियां

कि कितना गहरा है दर्द

लौटता बारंबार

कंधे की नसों में

कि निगाहें हैं इसमें

तन्मयता में पगीं

कि अब कुछ नहीं किया जा सकता

आशंकाओं और अफवाहों का

कि यह जो तन्मयता है

आत्मीयता है

इसकी रौशनी में हम

जो देख रहे हैं

क्षितिज के पार

वह रहस्य नहीं है अब।

प्रेम सारे रहस्‍येां को अनावृत कर देता है, जहां कुछ भी गोपन नहीं रहता -

और उसकी मुस्‍कान

फूटने को होती है

एक अवर्णनीय उल्‍लास में

यह अवर्णनीय उल्‍लास तब फूटता है जब वह कंधे से लग जाती है -

वह अक्‍सर बहुत हुलसकर गले मिलती है

और जब अलग होती है

तब उसकी जगह उसकी तन्‍मयता ले लेती है।

गले लगने और फिर अलग हो जाने के बाद भी एक तन्‍मय स्‍पर्श कवि के जेहन पर बना रहता है, प्रेम का यह बड़ा ही विरल एहसास है, जो एक साथ एंद्रिक भी है और इंद्रियेतर अनुभव भी। यह एहसास हमें आध्‍यात्मिक अनुभवों तक ले जाता है, जहां हमारी आत्‍मा प्रकृति के साथ तदाकार हो जाती है। कवि कहता है -

तन्‍मयता

समझते हैं ना आप तन्‍मयता के माने

मतलब तब हमारे आस-पास की

हर वस्‍तु बोलने लगती है

हमारी ही भाषा।

लेकिन ऐसा भी नहीं कि कवि प्रेम की तन्‍मयता में डूबा जीवन और जगत से बेखबर है, वह इस दुनिया और उसकी कारगुजारियों से भी वाकिफ है और जानता है -

कि रोजगार की कारगुजारियों ने मुझे

बना दिया होता है

कितना लाचार अंधा.अपाहिज

कि राजकमल की पंक्तियों के निहितार्थों से डरता

चला जाता हूं मैं

खुद की तलाश पूरी करने।

कवि पचासों मील चलकर केवल उससे मिलने जाता है ताकि खोए खुद को तलाश सके, उस खुद को जो गमे रोजगार और व्‍यवस्‍था की किसी अंधी गली में गुम हो गया सा लगता है -

और महानगरों की जकड्न को बारहा झटकता

चला जाता हूं मैं भागता

उस कस्बाई दिशा की ओर

वहां उस विगलित कोने में उसे उसके अपने स्‍व से भेंट होती है, मिलता है वह खुद से

जाता हूं देखने

अपना होना

कि यह हूं मैं

उस मैं की आंखों में दिखते हैं उसे लाल डोरे । वे लाल डोरे जिनमें व्‍यक्‍त पीडा को कवि न सिर्फ पढ सकता है बल्कि कापी पर उकेर भी सकता है। यहां प्रेम द्वैत भाव को खत्‍म कर देता है और एकत्‍व के रूप में बचता है जैसा भक्‍त कवियों के यहां दिखता है।

प्रेम की इन कविताओं में जहां मानवीय संबंधों की उष्‍मा है, उत्‍साह, उछाह और उमंग है, वहीं उदासी और अवसाद भी है। वैसे भी उदासी खुशी का एक्‍सटेंशन ही होती है। बहुत गहरी खुशी बारहा हमें रूला भी देती है। दिनों बाद मिलने का उछाह एक दुलार से भरता है तो साथ ही आंखों की कोरों को नम भी कर देता है -

गले मिलने का उसका हुलास

उसी आंखें का डबडबायापन

लेकिन इसके साथ ही -

उदासी का एक मतलब है,

खुश होने की संभावना'

और विडंबना देखिए कि

' सब कोसते हैं,

इस संभावना को ही'।

खुशी और उसकी आयरनिकल संबंधों की पड़ताल करता हुआ कवि कहता है -

उदासी

एक सोया हुआ तार है

एक

खींचा हुआ तार है

खुशी

हर खींचे हुए तार को

आखिर

सो जाना है।

खींचे हुए और सोये हुए तार के बिंबों से खुशी और उदासी के मेटाफर अद्भुत हैं। इस तरह के मेटाफर वही कवि चुन सकता है जिसने जीवन में इसे उतनी ही शिद्दत से अनुभूत किया हेा। कुमार मुकुल प्रमाणिक और जिये भोगे गए अनुभूतियों के कवि हैं तभी इनकी कविताओं में एक साथ प्रेम के उत्‍ताप से पिघलती अनुभूतियां हैं तो दूसरी ओर अवसाद की मन:स्थितियों का विरल चित्रण भी -

अब आईना ही घूरता है मुझे

और पार देखता है मेरे

तो शून्य नजर आता है

अवसाद का यह वह क्षण है जब व्‍यकित अपनी पहचान खोने लगता है, खुद से ही बेगाना, अजनबी हो जाता है, तभी आईना में खुद को नहीं देखता बल्कि अब आईना ही उसे घूरता है और उकसे पार देखता है तो शून्‍य नजर आता है। यह शून्‍य भाव अवसाद का प्रमुख लक्षण है जब व्‍यक्ति पूरी तरह से नकारात्‍मकता और निराश के जंगलों में खो सा जाता है। अवसादित मन की निराशा को व्‍यक्‍त करने के लिए कुछ अद्भुत बिंब रचे हैं कवि ने। यहां चांद आभा, उत्‍फुल्‍लता और प्रेम का प्रतीक न बनकर स्‍वप्‍नों को रेतने वाला हंसिया बन गया है-

चांद की हंसिए सी धार अब

रेतती है स्वप्न

और दुख -

जहां खडखडाता है दुख

पीपल के प्रेत सा

अडभंगी घजा लिए

चरम अवसाद की मनोदशा को अभिव्‍यक्‍त करता एक और चित्र देखिए जहां आशा प्रेतनी की तरह अपनी सफेद जटा फैलाए हा हा हा हू हू हू कर रही है- कि चीखती है

आशा की प्रेतनी

सफेद जटा फैलाए

हू हू हू

हा हा हा

आ आ आ

हू हा आ के घ्‍वन्‍यात्‍मक बिंब द्वारा कवि प्रेतनी की चीख की भयंकरता और बढा देता है, यहां गौरतलब है कि यह प्रेतनी आशा का बिंब है, तो अवसाद की मनोदश का ऐसा यथार्थ और मार्मिक चित्रण अन्‍यत्र दृष्टिगत नहीं हेाता।

अगर भाषा स्‍मृतियेां के दबाव से बनती है तो कविताएं अवचेतन के गहरे दबाव और तनाव से नि:सृत होती है। यही कारण है कि कुमार मुकुल की कविताओं में अवचेतन का प्रवाह दिखता है, ये कविताएं अवचेतन या स्‍ट्रीम आफॅ सबकांसस के रूप में आकार पाती हैं, और शायद इसीलिए परिनिष्ठित हिंदी में लिखी इन कविताओं में कुमार मुकुल के अवचेतन मे धंसे मातृभाषा भोजपुरी के शब्‍द अनायास चले आते हैं। डांसती,धांगता,अड़भंगी,निंदियायी, अंकवार, हुलास, टुकुर-टुकुर, बबुआ सा आदि सैकड़ों भोजपुरी के शब्‍द आपको मिल जाएंगे। जो कविता के प्रवाह और अर्थान्विति को गति देते हैं। कुमार मुकुल की कविताओं से गुजरना अपने जिए गए जीवन और अनुभवों को एक बार फिर से जीना ही नहीं, बल्कि एक नई रोशनी और संवेदना के सथ उनसे जुड़ना होता है, जिसमें बहुत सारे तथ्‍यों और अनुभवों को आप एक नये आयाम, एक नये आलोक में देखने लगते हैं और जीवन की आपकी समझ और बढ जाती है।

गहरे प्रेम की गहरी कविताएँ ... प्रांजल धर

‘एक उर्सुला होती है’ कवि कुमार मुकुल का ताज़ा कविता संग्रह है जिसकी कविताएँ जीवन और समाज में छीजते जा रहे प्रेम को केन्द्र में लाते हुए एक सार्थक-साहित्यिक हस्तक्षेप की बुनियाद रखती हैं। इस संग्रह में कुमार मुकुल विंसेंट वॉन गॉग और उर्सुला के बहाने प्रेम की प्रचलित परिभाषाओं से मुठभेड़ करते हैं और भावनाव्यंजक शब्दों के प्रायः विस्थापित होते चले जा रहे अर्थों को उनके सही पते-ठिकाने पर वापस लाने का काम करते हैं। संग्रह की एक कविता है, जिसका शीर्षक है ‘वॉन गॉग की उर्सुला’। इस कविता की पंक्तियाँ हैं – “हाँ सचमुच की उर्सुला जब/ खो जाती है कहीं/ ज़िन्दगी की किताब में/ तब जीवित होने लगती है वह/ विंसेंट के लहू में/ निगाह में उसकी/ उसके इशारों में।” इस कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हमारे समय की उस बेबसी और भीतर तक पैठ चुके उस गहरे डर को रेखांकित करती हैं जो हम सबमें साझा है और जिसके कारण कहीं न कहीं तथाकथित समाज में तथाकथित सम्पर्कसूत्रता का आभास होता है। प्रेम की कोख में बैठा यही डर वह पहला झटका था जो विंसेंट वॉन गॉग को बहुत कम उम्र में ही लग गया था क्योंकि जब उन्होंने अपने मकान मालिक की लड़की उर्सुला से अपने प्रेम का इजहार किया था, तो उन्हें इस प्रेम की स्वीकृति नहीं मिली थी। कारण यह था कि उर्सुला किसी और व्यक्ति से प्रेम करती थी।
‘परिदृश्य के भीतर’ (2000) और ‘ग्यारह सितम्बर और अन्य कविताएँ’ (2006) के बाद यह कुमार मुकुल का तीसरा कविता संग्रह है। पहले के दोनों संग्रहों में अपनाए गये काव्यात्मक उपकरणों, भावना-निरूपण की शैलियों और व्यंजनात्मकता के प्रारूपों का विकास सहज ही इस तीसरे संग्रह की कविताओं में दीखता है। एक तरह से यह पहले के दोनों संग्रहों की अगली कड़ी और उनका आनुभविक विस्तार है क्योंकि इस संग्रह की कविताओं में कुमार मुकुल ऐसे विषयों से काव्यात्मक मुठभेड़ करते हैं, जिन पर उन्होंने इससे पहले, इतनी अधिक सघनता से नहीं लिखा था। वे यहाँ प्रेम को उसके मांसल और कल्पनातीत दोनों पहलुओं में देखते हैं और लिखते हैं कि “प्यार/ और दो नामालूम-से जन/ एक-दूसरे को बनाना शुरू करते हैं विराट/ तो फिर तमाम मिथकों और दन्तकथाओं को/ उनका पार पाना कठिन पड़ने लगता है।” प्रेम की अपरिभाषेय ऊँचाई का जायजा लेने वाले इस संग्रह की कविताएँ गहरे प्रेम की गहरी कविताएँ हैं। संग्रह में प्रेम की गहन भावनाओं से परिपूरित अनेक कविताएँ हैं लेकिन ये वैसी प्रेम कविताएँ नहीं हैं जिनमें जब तक दो-चार बार प्रेम-प्रेम शब्द न आए तब तक हम मान ही न पाएँ कि यह भी भला कोई प्रेम कविता है! फ़ेसबुक और तथाकथित नवीन जनसंचार माध्यमों के ज़माने में कुमार मुकुल की उर्सुला के अर्थ गूढ़ हैं। उतने ही गूढ़, जितने विंसेंट की ज़िन्दगी में थे।
कुमार मुकुल की इन कविताओं में प्रेम का सहज सौन्दर्य है, प्रेम के हित में किए जाने वाले त्याग और परित्याग की भावनाओं की लम्बी-सपाट और दुर्गम सड़कें हैं, समय-सापेक्ष प्रेम की विसंगतियों की नवीन शब्दावली है और आर्थिक अभावों व जीवन के झंझावातों से जूझते हुए कवि ने एक बेहतरीन संसार रचने की कोशिश की है। इन चीज़ों से जो बेचैनी उत्पन्न होती है, उसके बारे में मुकुल का कवि दर्ज़ करता है कि “यह बेचैनी ही अमरता है”। अमरता के छलावे को समझने वाले कुमार मुकुल साफ़ कहते हैं, “हम-तुम बदलते हैं/ समय बदलता है/ प्रीत कहाँ बदलती है।” प्रेम जब जीवन की अन्य आवश्यकतापरक और अपरिहार्यतामूलक चीज़ों से टकराता है, तब जो ऐंठन, तनाव व संघर्ष उत्पन्न होता है, उसे रचने में मुकुल सिद्धहस्त कवि हैं और यह क्लाइमेक्स इस संग्रह की अन्तिम कविता ‘उम्र के भीतर अमरता स्थिर किए’ में बखूबी दिखता है। वर्तमान जीवन के बेहद जटिल द्वन्द्व इन कविताओं में सौ बार उतरे हैं लेकिन मुकुल ने इन द्वन्द्वों के बीच में से हज़ार बार प्रेम का एक रास्ता गढ़ा है।
बहुत पुरानी चीज़ों के मायने किस ख़तरनाक तरीके से बदल जाते हैं, इस सामाजिक तथ्य को इतिहास और भूगोल के आलोक में देखते हुए ‘पत्थर पर’ नामक कविता एक नए आलोचकीय औज़ार के साथ प्रेम की व्याख्या की माँग करती है। इस कविता का अन्तिम हिस्सा बहुत विचार-भाव सम्पन्न है कि, “चाहे रेत पर तर्जनी से/ लिखो कोई नाम/ कि हवाएँ पढ़ लेंगी उसे/ और तमाशा नहीं बनाएँगी।” आज जब प्रेम ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन की अन्यान्य आधारिक भावनाएँ-संकल्पनाएँ तमाशे की शक्ल अख्तियार करती जा रही हैं, तब इस कविता की एक व्यापक सन्दर्भसापेक्षता बनती है। कुमार मुकुल की कविताओं में ‘कहीं कोई उदास गाता है’ और ‘अशेष दुष्टताओं का अभिनय’ करता है। कवि प्रेमिल व्यक्ति के रोष को दरकिनार करके कोमल कामनाओं की तरंगों में डूबता है। कवि की आत्मा भी अजीब होती है शायद। तभी मुकुल लिखते हैं कि “तू तो मेरी आत्मा का पोर्ट्रेट है कवि/ क्या इसे मैंने बनाया है/ या ज़माने के बनाए पोर्ट्रेट पर/ हस्ताक्षर भर कर दिए हैं मैंने।” मौलिकता के सन्धान की यह अकुलाहट इन प्रेम-कविताओं को बहुत विलक्षण बनाती है और रचयिता यहाँ स्वयं रचना से बाहर हो जाता है। कुछ बचता है तो रचना और पाठक के बीच का शान्तिपूर्ण संवाद। यह संवाद कवि ने प्रायः स्वयं से ही किया है, फिर भी यहाँ उन बीहड़ पगडण्डियों से किया गया संवाद भी मौज़ूद है, जिन पर कवि अपने जीवन वास्तव में चलता रहा है।
कुमार मुकुल संघर्षपूर्ण जीवन के कवि हैं, उम्मीद के कवि हैं, जनसरोकार के कवि हैं, ज़िन्दादिली के कवि हैं, गम्भीर और विश्लेषणपरक पत्रकारीय मस्तिष्क की प्रौढ़ता के साथ-साथ वे गाँव-जवाँर और किसान-देहात के कवि हैं। ‘एक उर्सुला होती है’ नामक इस संग्रह में भी वे इन सरोकारपरक विषयों से अपना ध्यान हटा नहीं पाए हैं, हालाँकि यह संकलन एक तरीके से प्रेम कविताओं का संकलन है। वे लिखते हैं, “बर्तन माँजते उसकी आँख बनी पीठ/ ये सब बुलाते रहते हैं मुझे/ और महानगरों की जकड़न को बारहा झटकता/ चला जाता हूँ मैं भागता/ उस कस्बाई दिशा की ओर।” ‘एक अच्छी-सी लड़की’ कविता में वे कहते हैं, “केक खिलाती है/ जिसका स्वाद वह शबरी की तरह पहले चख लेती है/ वह बहुत खुश होती है तो रोटी और दाल खिलाती है।” दाल-रोटी का यह संघर्ष इस कविता में प्रेम के कथानक से झाँकता रहता है, जैसे पौराणिकता में से सत्य या सत्य में से पौराणिकता झाँकती रही हो!
कविता की दुनिया की खूबसूरती यही है, कि यह हमें हमारे जीवन के अनजान-अनचीन्हे ऐसे कोनों तक हमें ले जाती है, जहाँ हम जाना तो चाहते हैं, पर अक्सर चाहे अक्षमता के कारण या फिर किसी और कारण से वहाँ तक जा नहीं पाते, अनुभव की उस ऊँचाई तक हम पहुँच नहीं पाते। कुमार मुकुल का कवि पाठकों के लिए पूरा स्पेस मुहैया कराता है और अपने अनुभवों को खँगालने का चिन्तनपरक व सुखद अवसर देता है। आज जब कॉरपोरेट समय में चारों ओर बिल्डरों और मकानों, फ्लैट, फ्लाईओवरों और मेट्रो का हो-हल्ला मचाया जा रहा है, तब कवि की निगाह घर पर है, मकान पर नहीं; प्रेम पर है, प्रेम की बाहरी रूप-सज्जा या बनावट पर नहीं। प्रेम की सुखद ऊष्मा पर उनका ध्यान है, ऐसी ऊष्मा पर जो अभावों और वंचना के संघर्षों से प्रायः अपने-आप पैदा हो जाया करती है।
प्रेम की बात करते हुए विषमता के चित्रों का भी सामने आना स्वाभाविक ही है। तमाम विषमताओं और खाइयों की विकरालता मापतीं ये कविताएँ बिम्बों की उन ज़रूरी गलियों में हमें ले जाती हैं, जिनके बारे में जानते सभी हैं लेकिन मानने को तैयार नहीं होते। ‘मनोविनोदिनी’ नामक कविता में जो बिम्ब उभरता है, वह पाठकों के मनोमस्तिष्क पर देर तक के लिए अपना असर छोड़ जाता है। कुमार मुकुल की इन कविताओं में आशंकाओं और कयास के स्वप्न भी अतार्किक नहीं हैं, मानवीय जीवन मूल्यों के सन्दर्भ में उनकी एक गम्भीर अर्थवत्ता और विद्रूपता है। अक्सर वे काव्यात्मक कण्ट्रास्ट के सहारे प्रेम के यथार्थ को और उसके आर-पार देखने की धारदार कोशिश करते हैं। कविताओं का शिल्प सघन भाव बोध को सधी हुई भाषा में उल्लिखित करता है।
यहाँ कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि अपनी बात को सरलता से कहने और अपने स्टैण्ड को रखने का हुनर है। इसीलिए ‘हृदय’ नामक कविता में हृदय अपने जैविक-भौतिक अर्थों से बहुत परे चला जाता है। अपने सम्पूर्ण अर्थों में इस संग्रह की कविताएँ पूरी दुनिया की कविताएँ हैं, न कि किसी स्थानीय शहर, कस्बे या गाँव की और न ही किसी भावना विशेष यानी प्रेम की। प्रेम की व्याप्ति का सलीका यहाँ धीमे-धीमें पंक्तियों में उतरता है और कविताएँ एक बीहड़ यात्रापथ तय करते हुए उस बिन्दु पर आ पहुँचती हैं, जहाँ पूरे समाज का प्रेम केन्द्र में आ जाता है। कथ्य के स्तर पर तो गहरे प्रेम की गहरी कविताओं वाला यह संग्रह भीतर तक प्रभावित करता ही है, शिल्प भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे बड़ी बात तो अट्ठावन कविताओं वाले इस संग्रह में कविताओं का उपलब्ध क्रम है जो धीमे-धीमे भावनाओं की सघनता और अनुभूति की तीव्रता की मजबूत जमीन की तरफ बढ़ता जाता है। निश्चित रूप से ‘एक उर्सुला होती है’ एक पठनीय और संग्रहणीय कविता संग्रह है।
नया ज्ञानोदय के जून 2017 अंक में प्रकाशित