राजस्‍थान पत्रिका

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गुरुवार, 8 जून 2017

सृजनात्‍मक जिजीविषा और जिगीषा का प्रतीक 'उर्सुला' - अनिल अनलहातु


हर रचनात्‍मक यात्रा में सहजीवन के रूप में किसी न किसी 'उर्सुला' की मौजूदगी अवश्‍य रहती है, इस संग्रह की कविताएं इसी बात की तस्‍दीक करती हैं। इस तरह कुमार मुकुल वॉन गॉग की 'उर्सुला' को एक प्रतीक में बदल देते हैं, उर्सुला जो प्रतीक है सृजनात्‍मक जीजिविषा और जिगीषा की। हर रचनाकार ओर कलाकार की जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब वह अपने रचनात्‍मक जीवन के चरम से गुजरता हुआ जीवन संघर्ष के थपेड़ों से जूझत है ऐसे में कोई 'उर्सुला' होती है जो उसके मानस को एक ढ़ाढस की तरह संबल प्रदान करती है। कहना न होगा कि यह वी उर्सुला है जो प्रसाद की कामायनी में मनु को श्रद्धा के रूप में मिलती है और उसके तुमुल कोलाहल से भरे जीवन में हृदय की बात की तरह राहत देती है।

कुछ इसी तरह बांगला कवि जीवनानंद दास ने भी अपनी कविताओं में उर्सुला को तलाशा है नाटर की वनलता सेन के रूप में।

' रात रात भर अंधकार में मैं भटका हूं

अशोक और बिम्‍बसार के धूसर लगते संसारों में

दूर समय में और दूर अंधकार में

मैं थका हुआ हूं -

चारों ओर बिछा जीवन के ही समुद्र का फेन

शांति किसी ने दी तो वह थी

नॉटर की वनलता सेन।

तो हर रचनाकार और कलाकार को उसके अंधेरे बंद कमरों से बाहर निकालती है एक उर्सुला एक वनलता सेन।

ये उर्सुलाएं जितनी बाहरी दुनिया में होती हैं उतनी ही भीतरी दुनिया में भी। बाजवक्‍त में कवियेां की खामख्‍याली में भी रहती हैं। जैसे आग्‍न्‍येष्‍का सोनी मुक्तिबोध के अंधेरे में विचरण करती रहती है जैसा कि रामविलास शर्मा कहते हैं। कवि लिखता है -

और होता है वह

एक विन्सेंट ही

ख़्याल को सनम समझता

ख़ुद को

ख़्याल से भी कम समझता

ये उर्सुलाएं यथार्थ के ऐंद्रिक धरातल पर जितनी होती हैं उसे अधिक अभौतिक और अशरीरी धरातल पर -

प्रेम शरीर की नहीं

आत्मा की बीमारी है

यह ज्वर जला डालता है सारे कलुष

प्रेमी बन जाते हैं

योद्धा पादरी शिक्षक

कवि का अभिप्रेत है कि यह प्रेम-ज्‍वर बना रहे सतत, क्‍येांकि यह ज्‍वर भर जाता है, आंखों में चमक, भाषा में खुनक और फिर तमाम विंसेंटों के भीतर उनकी उर्सुलाएं जाग पड़ती हैं, यहां तक कि -

दुनिया के क्रूरतम तानाशाह भी

अपने भीतर समेटते रहते हैं

एक बिखरती उर्सुला

ईवा ब्राउन और क्‍लारा पेताची को इन संदर्भों में देखा जा सकता है।

इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में ऐसी ही उर्सुलाएं रचे जाकर आकार पाती हैं।

कई कविताओं में कवि खामख्‍याली से निकलकर प्रेम के ठोस व ऐंद्रिक धरातल पर पूरी धज के साथ यात्रा करता है। जहां प्रेम, मृत्‍यु के साथ खत्‍म नहीं होता वह अपनी उदात्‍तता में मातृत्‍व में आकाश तलाशने लगता है -

वह

जो प्रेम करती है मुझे

कामना करती है अक्सर मेरी मृत्यु की

वह सोचती है

कि मैं मर जाउं एक बार

तो फिर से जिला लेगी वह

नये सिरे से

और साधिकार ले चलेगी

अंगुली पकड कर

नन्हें बालक.सा

अपने पीछे पीछे!

प्रेम की यह उदात्‍तता, गांधी और कस्‍तूरबा के परिपक्‍व प्रेम की ओर ईशरा करता है, जहां प्रेम ममत्‍व में तब्‍दील होता दिखता है।

कुमार मुकुल की कविताओं में प्रेम के कई शेड्स हैं। बड़े कैनवस पर प्रेम के इतने बहुविध चित्र कवि ने उकेरे हैं कि आप विस्मित हो जाते हैं। इन कविताओं की तन्‍मयता साथ बहा ले जाती है। कुछ कविताओं में जहां ममत्‍व में प्रेम अपनी सार्थकता और अमरता तलाशता है वहीं अन्‍य कविताओं में वह उससे एक साथीपने की उम्‍मीद भी करता है -

कि इस तरह वह

गोइंया सी

मेरे कंधों से लगकर चले।

ताकि दोनेां के जीवन एकाकार हो जाएं और उनके स्‍वप्‍न एक दूसरे की आंखों में पलें। क्‍योंकि -

उनकी संयुक्‍त हंसी से उद्भासित

सुबहें हैं उसमें

और

अंकवार. भर भर जिया गया

जीवन है

और शामें हैं

तेज भागती

अंधेरा करती जुल्फों को झटकती रातें

कि अकडती पीठ पर

धंसती हैं उंगलियां

कि कितना गहरा है दर्द

लौटता बारंबार

कंधे की नसों में

कि निगाहें हैं इसमें

तन्मयता में पगीं

कि अब कुछ नहीं किया जा सकता

आशंकाओं और अफवाहों का

कि यह जो तन्मयता है

आत्मीयता है

इसकी रौशनी में हम

जो देख रहे हैं

क्षितिज के पार

वह रहस्य नहीं है अब।

प्रेम सारे रहस्‍येां को अनावृत कर देता है, जहां कुछ भी गोपन नहीं रहता -

और उसकी मुस्‍कान

फूटने को होती है

एक अवर्णनीय उल्‍लास में

यह अवर्णनीय उल्‍लास तब फूटता है जब वह कंधे से लग जाती है -

वह अक्‍सर बहुत हुलसकर गले मिलती है

और जब अलग होती है

तब उसकी जगह उसकी तन्‍मयता ले लेती है।

गले लगने और फिर अलग हो जाने के बाद भी एक तन्‍मय स्‍पर्श कवि के जेहन पर बना रहता है, प्रेम का यह बड़ा ही विरल एहसास है, जो एक साथ एंद्रिक भी है और इंद्रियेतर अनुभव भी। यह एहसास हमें आध्‍यात्मिक अनुभवों तक ले जाता है, जहां हमारी आत्‍मा प्रकृति के साथ तदाकार हो जाती है। कवि कहता है -

तन्‍मयता

समझते हैं ना आप तन्‍मयता के माने

मतलब तब हमारे आस-पास की

हर वस्‍तु बोलने लगती है

हमारी ही भाषा।

लेकिन ऐसा भी नहीं कि कवि प्रेम की तन्‍मयता में डूबा जीवन और जगत से बेखबर है, वह इस दुनिया और उसकी कारगुजारियों से भी वाकिफ है और जानता है -

कि रोजगार की कारगुजारियों ने मुझे

बना दिया होता है

कितना लाचार अंधा.अपाहिज

कि राजकमल की पंक्तियों के निहितार्थों से डरता

चला जाता हूं मैं

खुद की तलाश पूरी करने।

कवि पचासों मील चलकर केवल उससे मिलने जाता है ताकि खोए खुद को तलाश सके, उस खुद को जो गमे रोजगार और व्‍यवस्‍था की किसी अंधी गली में गुम हो गया सा लगता है -

और महानगरों की जकड्न को बारहा झटकता

चला जाता हूं मैं भागता

उस कस्बाई दिशा की ओर

वहां उस विगलित कोने में उसे उसके अपने स्‍व से भेंट होती है, मिलता है वह खुद से

जाता हूं देखने

अपना होना

कि यह हूं मैं

उस मैं की आंखों में दिखते हैं उसे लाल डोरे । वे लाल डोरे जिनमें व्‍यक्‍त पीडा को कवि न सिर्फ पढ सकता है बल्कि कापी पर उकेर भी सकता है। यहां प्रेम द्वैत भाव को खत्‍म कर देता है और एकत्‍व के रूप में बचता है जैसा भक्‍त कवियों के यहां दिखता है।

प्रेम की इन कविताओं में जहां मानवीय संबंधों की उष्‍मा है, उत्‍साह, उछाह और उमंग है, वहीं उदासी और अवसाद भी है। वैसे भी उदासी खुशी का एक्‍सटेंशन ही होती है। बहुत गहरी खुशी बारहा हमें रूला भी देती है। दिनों बाद मिलने का उछाह एक दुलार से भरता है तो साथ ही आंखों की कोरों को नम भी कर देता है -

गले मिलने का उसका हुलास

उसी आंखें का डबडबायापन

लेकिन इसके साथ ही -

उदासी का एक मतलब है,

खुश होने की संभावना'

और विडंबना देखिए कि

' सब कोसते हैं,

इस संभावना को ही'।

खुशी और उसकी आयरनिकल संबंधों की पड़ताल करता हुआ कवि कहता है -

उदासी

एक सोया हुआ तार है

एक

खींचा हुआ तार है

खुशी

हर खींचे हुए तार को

आखिर

सो जाना है।

खींचे हुए और सोये हुए तार के बिंबों से खुशी और उदासी के मेटाफर अद्भुत हैं। इस तरह के मेटाफर वही कवि चुन सकता है जिसने जीवन में इसे उतनी ही शिद्दत से अनुभूत किया हेा। कुमार मुकुल प्रमाणिक और जिये भोगे गए अनुभूतियों के कवि हैं तभी इनकी कविताओं में एक साथ प्रेम के उत्‍ताप से पिघलती अनुभूतियां हैं तो दूसरी ओर अवसाद की मन:स्थितियों का विरल चित्रण भी -

अब आईना ही घूरता है मुझे

और पार देखता है मेरे

तो शून्य नजर आता है

अवसाद का यह वह क्षण है जब व्‍यकित अपनी पहचान खोने लगता है, खुद से ही बेगाना, अजनबी हो जाता है, तभी आईना में खुद को नहीं देखता बल्कि अब आईना ही उसे घूरता है और उकसे पार देखता है तो शून्‍य नजर आता है। यह शून्‍य भाव अवसाद का प्रमुख लक्षण है जब व्‍यक्ति पूरी तरह से नकारात्‍मकता और निराश के जंगलों में खो सा जाता है। अवसादित मन की निराशा को व्‍यक्‍त करने के लिए कुछ अद्भुत बिंब रचे हैं कवि ने। यहां चांद आभा, उत्‍फुल्‍लता और प्रेम का प्रतीक न बनकर स्‍वप्‍नों को रेतने वाला हंसिया बन गया है-

चांद की हंसिए सी धार अब

रेतती है स्वप्न

और दुख -

जहां खडखडाता है दुख

पीपल के प्रेत सा

अडभंगी घजा लिए

चरम अवसाद की मनोदशा को अभिव्‍यक्‍त करता एक और चित्र देखिए जहां आशा प्रेतनी की तरह अपनी सफेद जटा फैलाए हा हा हा हू हू हू कर रही है- कि चीखती है

आशा की प्रेतनी

सफेद जटा फैलाए

हू हू हू

हा हा हा

आ आ आ

हू हा आ के घ्‍वन्‍यात्‍मक बिंब द्वारा कवि प्रेतनी की चीख की भयंकरता और बढा देता है, यहां गौरतलब है कि यह प्रेतनी आशा का बिंब है, तो अवसाद की मनोदश का ऐसा यथार्थ और मार्मिक चित्रण अन्‍यत्र दृष्टिगत नहीं हेाता।

अगर भाषा स्‍मृतियेां के दबाव से बनती है तो कविताएं अवचेतन के गहरे दबाव और तनाव से नि:सृत होती है। यही कारण है कि कुमार मुकुल की कविताओं में अवचेतन का प्रवाह दिखता है, ये कविताएं अवचेतन या स्‍ट्रीम आफॅ सबकांसस के रूप में आकार पाती हैं, और शायद इसीलिए परिनिष्ठित हिंदी में लिखी इन कविताओं में कुमार मुकुल के अवचेतन मे धंसे मातृभाषा भोजपुरी के शब्‍द अनायास चले आते हैं। डांसती,धांगता,अड़भंगी,निंदियायी, अंकवार, हुलास, टुकुर-टुकुर, बबुआ सा आदि सैकड़ों भोजपुरी के शब्‍द आपको मिल जाएंगे। जो कविता के प्रवाह और अर्थान्विति को गति देते हैं। कुमार मुकुल की कविताओं से गुजरना अपने जिए गए जीवन और अनुभवों को एक बार फिर से जीना ही नहीं, बल्कि एक नई रोशनी और संवेदना के सथ उनसे जुड़ना होता है, जिसमें बहुत सारे तथ्‍यों और अनुभवों को आप एक नये आयाम, एक नये आलोक में देखने लगते हैं और जीवन की आपकी समझ और बढ जाती है।

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