राजस्‍थान पत्रिका

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गुरुवार, 8 जून 2017

गहरे प्रेम की गहरी कविताएँ ... प्रांजल धर

‘एक उर्सुला होती है’ कवि कुमार मुकुल का ताज़ा कविता संग्रह है जिसकी कविताएँ जीवन और समाज में छीजते जा रहे प्रेम को केन्द्र में लाते हुए एक सार्थक-साहित्यिक हस्तक्षेप की बुनियाद रखती हैं। इस संग्रह में कुमार मुकुल विंसेंट वॉन गॉग और उर्सुला के बहाने प्रेम की प्रचलित परिभाषाओं से मुठभेड़ करते हैं और भावनाव्यंजक शब्दों के प्रायः विस्थापित होते चले जा रहे अर्थों को उनके सही पते-ठिकाने पर वापस लाने का काम करते हैं। संग्रह की एक कविता है, जिसका शीर्षक है ‘वॉन गॉग की उर्सुला’। इस कविता की पंक्तियाँ हैं – “हाँ सचमुच की उर्सुला जब/ खो जाती है कहीं/ ज़िन्दगी की किताब में/ तब जीवित होने लगती है वह/ विंसेंट के लहू में/ निगाह में उसकी/ उसके इशारों में।” इस कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हमारे समय की उस बेबसी और भीतर तक पैठ चुके उस गहरे डर को रेखांकित करती हैं जो हम सबमें साझा है और जिसके कारण कहीं न कहीं तथाकथित समाज में तथाकथित सम्पर्कसूत्रता का आभास होता है। प्रेम की कोख में बैठा यही डर वह पहला झटका था जो विंसेंट वॉन गॉग को बहुत कम उम्र में ही लग गया था क्योंकि जब उन्होंने अपने मकान मालिक की लड़की उर्सुला से अपने प्रेम का इजहार किया था, तो उन्हें इस प्रेम की स्वीकृति नहीं मिली थी। कारण यह था कि उर्सुला किसी और व्यक्ति से प्रेम करती थी।
‘परिदृश्य के भीतर’ (2000) और ‘ग्यारह सितम्बर और अन्य कविताएँ’ (2006) के बाद यह कुमार मुकुल का तीसरा कविता संग्रह है। पहले के दोनों संग्रहों में अपनाए गये काव्यात्मक उपकरणों, भावना-निरूपण की शैलियों और व्यंजनात्मकता के प्रारूपों का विकास सहज ही इस तीसरे संग्रह की कविताओं में दीखता है। एक तरह से यह पहले के दोनों संग्रहों की अगली कड़ी और उनका आनुभविक विस्तार है क्योंकि इस संग्रह की कविताओं में कुमार मुकुल ऐसे विषयों से काव्यात्मक मुठभेड़ करते हैं, जिन पर उन्होंने इससे पहले, इतनी अधिक सघनता से नहीं लिखा था। वे यहाँ प्रेम को उसके मांसल और कल्पनातीत दोनों पहलुओं में देखते हैं और लिखते हैं कि “प्यार/ और दो नामालूम-से जन/ एक-दूसरे को बनाना शुरू करते हैं विराट/ तो फिर तमाम मिथकों और दन्तकथाओं को/ उनका पार पाना कठिन पड़ने लगता है।” प्रेम की अपरिभाषेय ऊँचाई का जायजा लेने वाले इस संग्रह की कविताएँ गहरे प्रेम की गहरी कविताएँ हैं। संग्रह में प्रेम की गहन भावनाओं से परिपूरित अनेक कविताएँ हैं लेकिन ये वैसी प्रेम कविताएँ नहीं हैं जिनमें जब तक दो-चार बार प्रेम-प्रेम शब्द न आए तब तक हम मान ही न पाएँ कि यह भी भला कोई प्रेम कविता है! फ़ेसबुक और तथाकथित नवीन जनसंचार माध्यमों के ज़माने में कुमार मुकुल की उर्सुला के अर्थ गूढ़ हैं। उतने ही गूढ़, जितने विंसेंट की ज़िन्दगी में थे।
कुमार मुकुल की इन कविताओं में प्रेम का सहज सौन्दर्य है, प्रेम के हित में किए जाने वाले त्याग और परित्याग की भावनाओं की लम्बी-सपाट और दुर्गम सड़कें हैं, समय-सापेक्ष प्रेम की विसंगतियों की नवीन शब्दावली है और आर्थिक अभावों व जीवन के झंझावातों से जूझते हुए कवि ने एक बेहतरीन संसार रचने की कोशिश की है। इन चीज़ों से जो बेचैनी उत्पन्न होती है, उसके बारे में मुकुल का कवि दर्ज़ करता है कि “यह बेचैनी ही अमरता है”। अमरता के छलावे को समझने वाले कुमार मुकुल साफ़ कहते हैं, “हम-तुम बदलते हैं/ समय बदलता है/ प्रीत कहाँ बदलती है।” प्रेम जब जीवन की अन्य आवश्यकतापरक और अपरिहार्यतामूलक चीज़ों से टकराता है, तब जो ऐंठन, तनाव व संघर्ष उत्पन्न होता है, उसे रचने में मुकुल सिद्धहस्त कवि हैं और यह क्लाइमेक्स इस संग्रह की अन्तिम कविता ‘उम्र के भीतर अमरता स्थिर किए’ में बखूबी दिखता है। वर्तमान जीवन के बेहद जटिल द्वन्द्व इन कविताओं में सौ बार उतरे हैं लेकिन मुकुल ने इन द्वन्द्वों के बीच में से हज़ार बार प्रेम का एक रास्ता गढ़ा है।
बहुत पुरानी चीज़ों के मायने किस ख़तरनाक तरीके से बदल जाते हैं, इस सामाजिक तथ्य को इतिहास और भूगोल के आलोक में देखते हुए ‘पत्थर पर’ नामक कविता एक नए आलोचकीय औज़ार के साथ प्रेम की व्याख्या की माँग करती है। इस कविता का अन्तिम हिस्सा बहुत विचार-भाव सम्पन्न है कि, “चाहे रेत पर तर्जनी से/ लिखो कोई नाम/ कि हवाएँ पढ़ लेंगी उसे/ और तमाशा नहीं बनाएँगी।” आज जब प्रेम ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन की अन्यान्य आधारिक भावनाएँ-संकल्पनाएँ तमाशे की शक्ल अख्तियार करती जा रही हैं, तब इस कविता की एक व्यापक सन्दर्भसापेक्षता बनती है। कुमार मुकुल की कविताओं में ‘कहीं कोई उदास गाता है’ और ‘अशेष दुष्टताओं का अभिनय’ करता है। कवि प्रेमिल व्यक्ति के रोष को दरकिनार करके कोमल कामनाओं की तरंगों में डूबता है। कवि की आत्मा भी अजीब होती है शायद। तभी मुकुल लिखते हैं कि “तू तो मेरी आत्मा का पोर्ट्रेट है कवि/ क्या इसे मैंने बनाया है/ या ज़माने के बनाए पोर्ट्रेट पर/ हस्ताक्षर भर कर दिए हैं मैंने।” मौलिकता के सन्धान की यह अकुलाहट इन प्रेम-कविताओं को बहुत विलक्षण बनाती है और रचयिता यहाँ स्वयं रचना से बाहर हो जाता है। कुछ बचता है तो रचना और पाठक के बीच का शान्तिपूर्ण संवाद। यह संवाद कवि ने प्रायः स्वयं से ही किया है, फिर भी यहाँ उन बीहड़ पगडण्डियों से किया गया संवाद भी मौज़ूद है, जिन पर कवि अपने जीवन वास्तव में चलता रहा है।
कुमार मुकुल संघर्षपूर्ण जीवन के कवि हैं, उम्मीद के कवि हैं, जनसरोकार के कवि हैं, ज़िन्दादिली के कवि हैं, गम्भीर और विश्लेषणपरक पत्रकारीय मस्तिष्क की प्रौढ़ता के साथ-साथ वे गाँव-जवाँर और किसान-देहात के कवि हैं। ‘एक उर्सुला होती है’ नामक इस संग्रह में भी वे इन सरोकारपरक विषयों से अपना ध्यान हटा नहीं पाए हैं, हालाँकि यह संकलन एक तरीके से प्रेम कविताओं का संकलन है। वे लिखते हैं, “बर्तन माँजते उसकी आँख बनी पीठ/ ये सब बुलाते रहते हैं मुझे/ और महानगरों की जकड़न को बारहा झटकता/ चला जाता हूँ मैं भागता/ उस कस्बाई दिशा की ओर।” ‘एक अच्छी-सी लड़की’ कविता में वे कहते हैं, “केक खिलाती है/ जिसका स्वाद वह शबरी की तरह पहले चख लेती है/ वह बहुत खुश होती है तो रोटी और दाल खिलाती है।” दाल-रोटी का यह संघर्ष इस कविता में प्रेम के कथानक से झाँकता रहता है, जैसे पौराणिकता में से सत्य या सत्य में से पौराणिकता झाँकती रही हो!
कविता की दुनिया की खूबसूरती यही है, कि यह हमें हमारे जीवन के अनजान-अनचीन्हे ऐसे कोनों तक हमें ले जाती है, जहाँ हम जाना तो चाहते हैं, पर अक्सर चाहे अक्षमता के कारण या फिर किसी और कारण से वहाँ तक जा नहीं पाते, अनुभव की उस ऊँचाई तक हम पहुँच नहीं पाते। कुमार मुकुल का कवि पाठकों के लिए पूरा स्पेस मुहैया कराता है और अपने अनुभवों को खँगालने का चिन्तनपरक व सुखद अवसर देता है। आज जब कॉरपोरेट समय में चारों ओर बिल्डरों और मकानों, फ्लैट, फ्लाईओवरों और मेट्रो का हो-हल्ला मचाया जा रहा है, तब कवि की निगाह घर पर है, मकान पर नहीं; प्रेम पर है, प्रेम की बाहरी रूप-सज्जा या बनावट पर नहीं। प्रेम की सुखद ऊष्मा पर उनका ध्यान है, ऐसी ऊष्मा पर जो अभावों और वंचना के संघर्षों से प्रायः अपने-आप पैदा हो जाया करती है।
प्रेम की बात करते हुए विषमता के चित्रों का भी सामने आना स्वाभाविक ही है। तमाम विषमताओं और खाइयों की विकरालता मापतीं ये कविताएँ बिम्बों की उन ज़रूरी गलियों में हमें ले जाती हैं, जिनके बारे में जानते सभी हैं लेकिन मानने को तैयार नहीं होते। ‘मनोविनोदिनी’ नामक कविता में जो बिम्ब उभरता है, वह पाठकों के मनोमस्तिष्क पर देर तक के लिए अपना असर छोड़ जाता है। कुमार मुकुल की इन कविताओं में आशंकाओं और कयास के स्वप्न भी अतार्किक नहीं हैं, मानवीय जीवन मूल्यों के सन्दर्भ में उनकी एक गम्भीर अर्थवत्ता और विद्रूपता है। अक्सर वे काव्यात्मक कण्ट्रास्ट के सहारे प्रेम के यथार्थ को और उसके आर-पार देखने की धारदार कोशिश करते हैं। कविताओं का शिल्प सघन भाव बोध को सधी हुई भाषा में उल्लिखित करता है।
यहाँ कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि अपनी बात को सरलता से कहने और अपने स्टैण्ड को रखने का हुनर है। इसीलिए ‘हृदय’ नामक कविता में हृदय अपने जैविक-भौतिक अर्थों से बहुत परे चला जाता है। अपने सम्पूर्ण अर्थों में इस संग्रह की कविताएँ पूरी दुनिया की कविताएँ हैं, न कि किसी स्थानीय शहर, कस्बे या गाँव की और न ही किसी भावना विशेष यानी प्रेम की। प्रेम की व्याप्ति का सलीका यहाँ धीमे-धीमें पंक्तियों में उतरता है और कविताएँ एक बीहड़ यात्रापथ तय करते हुए उस बिन्दु पर आ पहुँचती हैं, जहाँ पूरे समाज का प्रेम केन्द्र में आ जाता है। कथ्य के स्तर पर तो गहरे प्रेम की गहरी कविताओं वाला यह संग्रह भीतर तक प्रभावित करता ही है, शिल्प भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे बड़ी बात तो अट्ठावन कविताओं वाले इस संग्रह में कविताओं का उपलब्ध क्रम है जो धीमे-धीमे भावनाओं की सघनता और अनुभूति की तीव्रता की मजबूत जमीन की तरफ बढ़ता जाता है। निश्चित रूप से ‘एक उर्सुला होती है’ एक पठनीय और संग्रहणीय कविता संग्रह है।
नया ज्ञानोदय के जून 2017 अंक में प्रकाशित

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